बाबासाहाब और रमाई के जीवन के वो मर्मभेदी पल, जिसे पढ आखोसे छलकते आसू को ना रोख पाओगे - HUMAN

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Sunday, 29 April 2018

बाबासाहाब और रमाई के जीवन के वो मर्मभेदी पल, जिसे पढ आखोसे छलकते आसू को ना रोख पाओगे

   

मर्मभेदी लम्हे 


      बाबासाहाब का अधिकतर समय किताबो मे हि बितता | इतना व्यस्त रहते की दो वक्त के खाणे का भी उनको ध्यान नही रहता | रमाई खाणे के लिये राह देखती | मेरी राह मत देखो बाबासाहाब गुस्सा होते | लेकीन उनके खाये बगैर रमाई के गले से निवाला कैसे उतरता भला |


     ''आपका परिवार की तरफ बिलकुल भी ध्यान नही होता , थोडा भी समय नही  देते आप परिवार को |'' ये रमाई की बात बाबासाहब के मन को चुभी | दुसरे दिन घर लौटते वक्त बाबासाहाब जी सब्जी घर ले आये | उनके हाथ मे इतनी सारी सब्जी देख उनकी भाभी लक्ष्मीबाई जोर जोर से हसणे लगी , कहा - ''देवरजी  इतनी सारी सब्जी एक दिन मे खत्म नही होगी और दुसरे दिन सब्जी खराब हो जायेगी |'' और बेईज्जति ना हो इस डर से बाबासाहाब जल्द किचन मे गये सब्जी रखने| इतनी सारी सब्जी देख रमाई भी हसणे लगी | अपना कहा सून बाबासाहाब परिवार की तरफ ध्यान देणे लग गये यह सोच आई रमा खुश हुई | कभी बाजार ना लानेवाले बाबासाहाब को इतनी सारी सब्जी लाये यह उनका व्यवहारज्ञान देख आई रमाई की हंसी नही रुक रही थी |

एक दो दिन बाद ऑफिस मे यह घटीत प्रसंग उन्होने अपने दोस्तो को बताकर और अपने  व्यावहारिक ज्ञान की आलोचना की  | सभी जन हसणे लगे | बाबासाहाब ने उनके हसी मे अपनी हसी मिलायी | थोडे समय बाद हसी रोक वे बोले,  ''बिवी बच्चो से कैसे व्यवहार करे ये मुझे समझ मे नही आता, लेकीन किताबो से मेरी अच्छी बनती है |''

राजरत्न का आगमन 


यशवंत के बाद जन्म लेनेवाले उनके तीन अपत्य ज्यादा दिन तक जीवित नही रहे | इंदू. रमेश और गंगाधर की मौत के बाद रमाई बहुत हि टूट चुकी थी | अब पैसो की कमी ना थी | १५ जून १९२४ को रमाई ने राजरत्न को जन्म दिया | जैसे की निश्चित हुआ था बाबासाहाब जी ने उसका नाम राजरत्न रखा |

राजरत्न दिखने मे बिलकुल हि बाबासाहाब जी के नक्षे पर गया था | उसका वह प्यारा रूप देखकर बाबासाहाब बहुत खुश होते | अब पैसो के अभाव से होनेवाली बच्चो की बुरी हालात आगेसे नही होगी यह भी मन ही मन तय था | यशवंत और मुकुंद की पढाई की और वे खुद ध्यान देते | राजरत्न को थोडासा भी बुखार आया तो भी रमाई का मन कही भी नही लगता | बिमारी की हालात मे उसके तरफ बिलकुल अजर अंदाजी ना की दोनो ने | शाम को जब बाबासाहाब  कोर्ट से घर लौटते, तब राजरत्न के साथ खेलते थे | वो दो साल का हो चुका था | बाबासाहाब उसे शेर का बच्चा कहकर बुलाते |


दुखो का पहाड, संतान 

यशवंत को संधिवात होणे के कारण वो हमेशा बिस्तर पर हि रहता था , अब राजरत्न भी बिमार रहने लगा था | बाबासाहाब ने तो राजरत्न के उज्ज्वल भविष्य के हसीन सपने संजोये रखे थे | बहुत ध्यान रखने पर भी राजरत्न को १९२६ जुलाई के महिने मे डबल न्युमोनिया हुआ | बाबासाहाब, रमाई, लक्ष्मीबाई रात रात भर जागकर राजरत्न की सेवा करते | अच्छे डॉक्टर बुलाये | बाबासाहाब कोर्ट मे भी नही जाते | राजरत्न के पास बैठे रहते |

१८ जुलाई को राजरत्न को जरा अच्छा महसूस होणे लगा इस कारण बाबासाहाब हायकोर्ट के केस के काम से बाहर गये | बाबासाहाब के जाते हि राजरत्न का बुखार बढने लगा | रमाई घबराई | शंकर को कोर्ट भेज बाबासाहाब को त्वरित घर बुलाया उन्होने | साहब आये, राजरत्न को गोदी मे लिया | एक नजर राजरत्न ने बाबासाहाब की ओर देखा और आख हमेशा के लिये बंद की उसने | तब बाबासाहाब राजरत्न का नाम ले जोर जोर से रोने लगे |

रमाई का आक्रोश रुकने का नाम नही ले रहा था | छोटे बच्चे की तरह बाबासाहाब रोये | राजरत्न को गोदी मे से नीचे रखने को भी वे तैयार नही थे | राजरत्न उनकी जान था | वो था भी वैसा होशियार, सुंदर | उसके गुजर जाणे के बाद बाबासाहाब जी का अब परिवार मे बिलकुल भी मन ना लगता |

रमाई 

अब आई रमाई मे और ज्यादा दुख सहने की क्षमता हि नही रही थी | अब उनकी तबियत भी नाजूक हुई थी | राजरत्न के मृत्यू के पश्चात रमाई बिमार हि रहने लगी थी | बाबासाहाब ने उनके इलाज मे बिलकुल भी कमी ना की | अच्छेसे अच्छे डॉक्टर की तरफ से उनका इलाज कराया लेकीन उनकी तबियत ठीक होणे का बिलकुल हि नाम ना ले रही थी | साहब साथ होते हुये भी और राजरत्न के इलाज मे कुछ भी कमी ना करणे पर भी उसकी तबियत मे कही भी सुधार ना हुआ, इस बात पर रमाई को बिलकुल भी यकीन नही हो रहा था | राजरत्न की याद से वे बहुत हि दुखी होती ... रोते  बैठती | सभी तरह के गम को पी जाने मे चतुर आई रमाई इस गम को छुपा ना सकी | उनका देह और मन दोनो कमजोर बन चुके थे | तीन लडके और एक लडकी ऐसे चार बच्चे काल के चक्र ने उनके गोदी से छीने थे | लेकीन राजरत्न की मृत्यू से रमाई इतनी टूट चुकी थी की फिर  इस गम से उभर ना सकी |