इन दो माताओ के ये कार्य देख : इनके फॅन होणे से खुद को रोक ना पाओगे - HUMAN

Breaking

Saturday, 12 May 2018

इन दो माताओ के ये कार्य देख : इनके फॅन होणे से खुद को रोक ना पाओगे


त्याग की मूर्तिमंत रुपिकाये 

    महान, अमर हर कोई नही हो सकता | अभूतपूर्व त्याग करणा होता है इसके लिये अपने जीवन मे | अपार कष्ट, अनेक पिडाये, यातनाये सही होती है इसके लिये इन महामानवो ने | मन को भी उस तरह से विशाल करणा होता है, विकारो रहीत रखना होता है |

आई रमाई

     आई रमाई की बात करे तो नाम से ही ममत्व, अपार स्नेह छ्लकता है | करुणा का सागर इनके अंदर प्रवाहित होता था | बाबासाहाब जितनी चिंता, कणव इनके भी मन मे थी पिछ्डो के लिये उस वक्त | निम्न वर्णीत यह प्रसंग गवाह है इस बात का |


          एक वक्त की बात है, तब बाबासाहाब लंदन मे थे | आई रमाई की तबियत ठीक ना होणे के वजह से बाबासाहाब ने मोसम, हवा, पाणी में बदलाव इस उद्देश से गृहस्थ वराले कें साथ आई रमाई, लक्ष्मी भाभी और बेटे यशवंत को धारवाड भेजा | धारवाड में रमाई को अच्छा लगता| वहा का हवा, पाणी उन्हे भाता | वहा के निवासआश्रम के बच्चो से उनकी खूब जमती | एक दिन आई रमाई के ध्यान मे आया निवासआश्रम के  रसोई से धूआ  नही निकल रहा था | उन्होने वराले के पत्नी से पुछा, तब पता चला कि, छे महिनो से आश्रम को शासकीय अनुदान मिला ही नही | आजतक कर्जे के सहायता से जैसे तैसे गुजारा हुआ | लेकीन अब वो भी नही मिल रहा | दुकानदार किराणा सामान देणे से इन्कार कर रहा है | आश्रम कि इमारत का किराया भी थकीत है | यह सून आई रमाई का ममतामयी मन पिघल गया |




  हाथ के सोने के कंगन निकाल वराले के हाथ में रखते हुये कहा, ''बलवंत भैया, चिंता मत करो, इस चुडीयो को बेचो और बच्चो के खाणे का इंतजाम करो | बच्चो को भुखा मत रखो |''

      वराले मामा ने रमाई की चुडीया मारवाडी के पास गिरवी रखी, तब बलवंतराव की आंखे नम हो गयी | उस दिन रमाई और राधाबाई ने खुद अपने हाथो से खाना पकाकर बच्चो को परोसा | खाते वक्त अजीब सा सुकून बच्चो के चेहरे से छलक रहा था | उन सभी बच्चो को उस दिन रमाई के रूप में मां ही दिखी | 

आई सावित्री 

शिक्षा एक संस्कार है | बच्चो पर संस्कार उसके माता से होते है | उस वजह सें माता का शिक्षित होणा अत्यंत आवश्यक है ये फुले दाम्पत्ती का पहला प्रमेय था| सावित्री आई स्कूल में पढाते वक्त सिर्फ लिखना,पढना ही नही सिखाती तो उनपर अच्छे संस्कार भी करती | स्त्री-शूद्रो के गुलामगिरी का इतिहास पढाती | स्वतंत्रता का महत्व उन्हे बताती | उनमे आत्मविश्वास जगाती | 



    ज्योतीराव - सावित्री के स्कूल कि दुसरी वार्षिक एक्जाम पुना में तारीख १२ फरवरी १८५३ को ली गयी | यह एक्जाम देखणे के लिये असंख्य लोगो कि भीड इकठ्ठा हुई थी | इस उपरांत कार्यक्रम कि अध्यक्षा मिसेस इ. सी. जोन्स इनके हस्ते बक्षीश दिये गये | बक्षीस का स्वीकार करते वक्त एक छोटीसी बच्ची ने बडे ही उत्साह से अध्यक्ष से कहा, ''हमे बक्षीस के रूप मिठाई, खिलोने नही, हमे स्कूल का  ग्रंथालय चाहिये | '' ऐसी सोच इस बच्ची में कहा से विकसित हुई थी ? पढाई कि रुची थी आई सावित्री को ! पढने से इन्सान ज्ञानी बनता है उन्हे  पता था | यह रुची उन्होने अपनी  स्कूल की बच्चीयो  में भी निर्माण कि थी |



    मुक्ताबाई सालवे मातंग समाज की लडकी सावित्रीआई की छात्र | अपने एक निबंध में लिखती है, एक मात्र छुने के कि बंदी से हमपर कितने दुखो का प्रभाव होता है? इसी कारणवश हमे कोई कामपर नही रखता | अगर रोजगार हेतू इतने बंधन तो हमे पैसा कहा से मिलेगा |''मुक्ताबाई अपने समाज बांधवो को पढने लिखने के लिये आग्रहित स्वर मी कहती है , '' गरिबी और दुखो से पिडीत मांग महार लोगो, आप बिमार हो, तो अपने बिमार बुद्धी को ज्ञानरुपी दवा दो | याने फिर आपके भीतर की कुकल्पना नष्ट होकर आप नीतिमान बनोगे, दिन-रात जानवरो जैसी होनेवाली आपकी हाजरी वो बंद होगी| तो अब पढो मन लगाकर, फिर ज्ञानी होकार मन सुसंस्कारित होगा |''

     छुआ छुत का तिरस्कार करनेवाली मुक्ताबाई के मन पर आई सावित्री के अध्ययन का प्रभाव दिखता है | ऐसे संस्कारित पीडी का निर्माण इन जैसे महान व्यक्तित्व के हाथो हि संभव है |