आषाढ कें महिने में गुवाहाटी कें कामाख्या मंदिर की देवी को होती है माहवारी - HUMAN

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Wednesday, 6 June 2018

आषाढ कें महिने में गुवाहाटी कें कामाख्या मंदिर की देवी को होती है माहवारी

पाखंड का मुर्खतापूर्ण और भेदभाव जन्य रूप 

गुवाहाटी का  कामाख्या मंदिर 

   आषाढ़ के महीने में गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की देवी को माहवारी होती है.देवी को होने वाली इस सालाना माहवारी का भक्त पूरे साल इंतज़ार करते हैं. 4 दिन तक मंदिर बंद रहता है और कोई भी देवी के दर्शन नहीं कर सकता.मंदिर की देवी की अनुमानित योनि के पास पुजारी साफ़ नए कपड़े रखते हैं, और 4 दिन बाद ‘खून’ से भीगा यह कपड़ा भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है. इस कपड़े का प्रसाद में मिलना बड़ी क़िस्मत की बात मानी जाती है और इसलिए इसे लेने मांगने की चाह वालों की तादाद भी काफ़ी ज़्यादा होती है.डिमांड के हिसाब से सप्लाई के लिए कपड़े के छोटे छोटे टुकड़े किए जाते हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को यह माहवारी वाला दिव्य प्रसाद नसीब हो सके.;

ब्रह्मपुत्र के पानी में हर साल इस दौरान रंग डाल देते हैं, जिसके कारण नदी का पाणी लाल होता है

माना जाता है कि देवी को हो रही माहवारी के कारण ही ब्रह्मपुत्र का पानी भी उन 4 दिनों के लिए लाल हो जाता है. इस बारे में कई अफ़वाहें भी हैं.कई लोगों का मानना है कि मंदिर के पुजारी ख़ुद ही घटना का वज़न बढ़ाने के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी में हर साल इस दौरान रंग डाल देते हैं.ख़ैर, जो भी हो इतना तो तय है कि देवी के खून से सने कपड़ों से लेकर ब्रह्मपुत्र के पानी तक, लोग श्रद्धा से ख़ुद को बेहद ख़ुशक़िस्मत मानकर देवी की माहवारी का जश्न मनाते हैं.जब मुझे यह सब पता चला था तब लगा कि इस देश में मूर्खता की कोई सीमा सोच पाना, खुद ही मूर्खता है.मतलब, जरा सोच कर देखिए हम मूर्ख और अव्वल दर्जे की बकवास कल्पनाओं में कितना आगे निकल चुके हैं | कामाख्या देवी की कथित माहवारी के कपड़े प्रसाद में लेने के लिए जिनके हाथ बड़ी श्रद्धा में पसर कर ख़ुद को कृतार्थ मानते हैं, वही लोग अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को उनकी माहवारी में गंदा मानकर कैसे अछूत मान लेते हैं, यह मेरी समझ के बाहर है. पुरुष कहेंगे कि घर की औरतों का मामला है, औरतें ही मानती हैं और औरतें ही मनवाती हैं। वह नहीं कहते ऐसा करने को.ठीक है, लेकिन कभी ऐसा ना करने को भी तो नहीं कहते | कभी समझाते भी तो नहीं कि क्यों ऐसा करना फ़ालतू और बकवास काम है |




औरतों के साथ तो भेदभाव है ही,जानवर भी इससे अछूते नहीं 

  एक बार फ़िर कहूंगी, अजीब है यह क़ौम | औरतों के साथ तो भेदभाव है ही.जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं.दुकानों में कुत्ते बिकते हैं. नस्ल के हिसाब से क़ीमत तय होती है.वहां भी कुत्ते की क़ीमत ज्यादा होती है. कुतिया की क़ीमत कम होती है। आप में से अगर किसी के पास कभी कुतिया रही हो तो आप जानते होंगे कि उसको भी माहवारी होती है। वो पैड तो लगा नहीं सकती, सो जहां बैठती है, वहीं ब्लड टपकता रहता है.लोगों को इससे आपत्ति है.यह नहीं कि उसे एक चादर दे दें, लोगों को बस घृणा आती है.इसलिए कुतिया पालने से आपत्ति है, और इसलिए ही उनकी क़ीमत कम होती है. गाय का मामला अलग है.
गाय क्योंकि दूध देती है इसलिए उसकी क़ीमत और उसका मान ज़्यादा होता है. कहावत है ना कि दुधारु गाय की लात भी सही वैसे ही.दिक़्क़त बस यही है कि जो लोग देवी की माहवारी को श्रद्धा से देखते हैं, वे यह सब कैसे कर पाते हैं.देवी आपके बच्चे नहीं जनेंगीं, ना ही वह आपका घर और आपका परिवार संभालेंगी.फ़िर क्यों है देवी की ‘गंदगी’ पर इतनी श्रद्धा? और जिस देवी को खुद यह ‘गंदगी’ होती हो, वह किसी और लड़की या महिला के अपने माहवारी के दौरान छू दिए जाने से कैसे गंदी हो सकती है, यह मेरी समझ के बाहर है|