मॉब लिंंचींग : आरा के बिहिया में रेलवे स्टेशन के पास हैवानियत का ये नंगा नाच - HUMAN

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Wednesday, 22 August 2018

मॉब लिंंचींग : आरा के बिहिया में रेलवे स्टेशन के पास हैवानियत का ये नंगा नाच


बिहार की सड़कों पर "सुशासन" को नंगा कर घुमाया जा रहा हैं


सुशासन में बेशर्म समाज का नंगापन, 'द्रौपदी' फिर बेपरदा, भीड़ बनी 'दु:शासन'


 बिहार में स्वघोषित सुशासन की सरकार है. भले ही आए दिन बलात्कार, छेड़छाड़, मर्डर, किडनैपिंग, मॉब लिंचिंग जैसी संगीन वारदातें पेश आती हैं. एक बार फिर ऐसी घिनौनी और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जो अगर आप जिंदा हैं तो रूह कांप जाएगी. लेकिन अगर आपकी शर्म, संवेदना और शराफत मर चुकी हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

बिहार में नीतीश सरकार के सुशासन की ये वो वीभत्स तस्वीर है, जिसे हम आपको बिना ब्लर किए दिखा भी नहीं सकते.
तस्वीर इतनी शर्मनाक, खौफनाक और दर्दनाक कि आपको इस सभ्य समाज की शराफत से घिन्न आ जाएगी. समाज में छिपे वहशीपन और नंगेपन की वो तस्वीर जिससे हमें और आपको खुद से नफरत होने लगेगी।

सड़क पर नंगी दौड़ती-भागती एक मजबूर महिला और उसे पीटते ये शैतान. सुशासन की सरकार के वो दुशासन, जो इस महिला को बीच सड़क पर बिना कपड़ों के दौड़ाता रहा. उसकी इज्जत और आबरू को सरेआम नंगाकर नंगई की सारी हदें पार कर दी.

सभ्य समाज के किसी भी सज्जन को इस महिला में देवी तो छोड़िए बहन-बेटी या मां की तस्वीर नहीं उभरी. इस द्रौपदी के चीर-हरण रोकने से लेकर उसकी जान बचाने तक को कोई आगे नहीं बढ़ा. मानो भीड़ में मौजूद हर शख्स या तो तमाशबीन बन इस नंगी महिला को देखने में अपना पौरुष समझ रहा था, या हर कोई नपुंसक बन बैठा था.

आरा के बिहिया में रेलवे स्टेशन के पास हैवानियत का ये नंगा नाच सोमवार दोपहर हुआ. दरअसल, रेलवे स्टेशन के पास विमलेश कुमार नाम के युवक का शव बरामद हुआ था
लोगों को शक था कि यही महिला उसके कत्ल में शामिल है. सो कानून को ठेंगा दिखाते हुए फैसला ऑन द स्पॉट सुना दिया कि मार डालो इसे।

देखते ही देखते सैकड़ों की तादाद में लोग इकट्ठा हो गए, उन्मादी भीड़ ने महिला के घर पर हमला बोल दिया और घर को फूंक दिया. इसी बीच महिला को खींच कर सड़क पर ले आए. सरेआम उसके कपड़े फाड़ दिये गये और उसे नंगा कर दिया गया.

हैवानों का खेल यहीं नहीं रुका. उसे नंगा करके सड़क पर दौड़ा दिया. आगे-आगे महिला इज्जत और जान बचाने के लिए भागती रही और पीछे-पीछे भीड़ रुपी दुशासन. बिहिया में बीच सड़क पर ये शैतानी खेल घंटों चलता रहा. लेकिन काहे का सुशासन और काहे की पुलिस. घंटों बाद पुलिस पहुंची और कोरी कार्रवाई करने में जुट गई। जाहिर है अब कुछ गिरफ्तारियां होंगी, कुछ अधिकारियों पर गाज गिरेंगी. सरकार सख्ती का दावा करेगी, विपक्ष हाय-तौबा मचाएगा, फिर सब कुछ भुला दिया जाएगा. लेकिन सुशासन बाबू जवाब दीजिए क्या यही है आपका सुशासन, यही है महिला सुरक्षा का दावा, इसे ही कहते हैं कानून का राज, जहां महिला को नंगाकर बीच सड़क पर उसकी इज्जत उतारी जाती है. भला आपके प्रदेश में महिला खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी. शर्मनाक शब्द भी इस समाज और सरकार के लिए छोटी पड़ जाती है।

कभी ध्यान दिया है? 


चाहे डायन बताकर भरे बाज़ार मारने की घटना हो,या बच्चा-चोर की अफ़वाह को सच मानते हुए सरेआम मार डालने की बात हो अथवा किसी महिला पर कोई भी आरोप हो,इस समाज के पुरुष भीड़ की सबसे पहली कोशिश होती है कि उस महिला को नंगा कर दिया जाय!  मतलब भयंकर नफ़रत की अवस्था में भी पुरुष के अंदर की कुण्ठा बनी रहती है! masculinity और sexual frustration का लेवल देखिये!  मतलब ये कि जो पहले यही समाज महिला की इज्ज़त को उसकी देह (बल्कि देह के कुछ ख़ास अंगों) से जोड़ता है, और फिर उसे लगता है कि देह को नंगा कर देने से एक महिला को सबसे अधिक बेइज़्ज़त किया जा सकता है!

 masculinity मिश्रित सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन...






क्या कहता है भीड़ का मनोविज्ञान ?


मॉब लिंचिंग में एक व्यक्ति की चेतना जब भीड़ के सामूहिक मन में विलीन हो जाती है तो वह भीड़ की सोच से संचालित होता है। भीड़ में प्रबल आवेश होता है और एक अकेले व्यक्ति की सामाजिक संवेदना समाप्त हो जाती है। कानून व अन्य प्रकार का डर नष्ट हो जाता है। भीड़ में बुद्धि, विवेक, विचार काम नहीं करता। जांच-पड़ताल, सच-झूठ, अच्छाई-बुराई की परख खत्म हो जाती है। जोश इतने चरम पर होता है कि अपराध कर बच निकलने की सोच हर व्यक्ति को न केवल सुकून देती है, बल्कि अपराध करने पर उकसाती है।

चूहिया मार नहीं सकता, लेकिन हत्या कर जाता ?


लिंचिंग वाली भीड़ जब किसी पर गंभीर आरोप लगाती है तो उसकी जांच-पड़ताल करने का आपा खो बैठती है। जो व्यक्ति अपने जीवन में कभी किसी चूहिया को भी न मार पाया हो, वह यह सोचता है कि उसमें असीमित शक्ति का संचार हुआ है। वह यदि किसी की हत्या भी कर दें तो भीड़ में खो कर खुद को आसानी से बचा लेगा। अफवाहें इस कदर हावी हो चुकी होती है कि उसकी जांच करने के लिए भीड़ के पास फुर्सत नहीं होती। जिसे निशाना बनाया जाता है वह संख्या में कम होते है, इसलिए भीड़ का प्रतिरोध करने की वे सोच भी नहीं सकते।


दया व मानवीयता कुचलते है ?


लिंचिंग की भीड़ का उन्माद अमानवीय होता है। अपराध के खतरनाक मंसूबों में दया व मानवीयता को कुचला जाता है। चींटी जैसे मामूली जीव पर दया दिखाने वाला वही व्यक्ति खून की नदियां बहाने के लिए आतूर हो जाता है। धार्मिकता में खुद को श्रेष्ठ बताने वाला भी अत्यंत निर्दयता का बर्ताव करता है।

नैतिकता तो घांस चरने जाती है ?


मॉब लिंचिंग के दौरान भीड़ की नैतिकता तो मानो घांस चरने चली जाती है। निर्बल, लाचार, कमजोर, निहत्थे, हथियार विहिन व्यक्ति को लक्ष्य बनाने के बाद उसे रौंदकर आगे बढ़े बिना इस भीड़ का आवेश शांत नहीं होता। दंगों में इसका भयावह रूप दिखाई देता है। मनुष्य मूलत: सामाजिक प्राणी बाद में बना, पहले वह आदिमानव अवस्था में केवल जिंदा रहने की लड़ाई को जीतने के लिए हिंसक बना था। सामाजिक बनना इस आदिमानव की मजबूरी थी। समूह में रहने से सुरक्षितता के अलावा आसानी से भोजन पाने की उम्मीद बढ़ती चली गई और सामाजिक सहयोग की भावना ने आदिमानव को हिंसक प्राणी से इंसान बनने के लिए मजबूर कर दिया।

भीड़ हमेशा बुरी नहीं होती


भीड़ की आक्रामकता का सकारात्मक भी उपयोग किया जा सकता है। फुटबॉल के मैदान में झुंड में खेलने वाला एक समूह, दूसरे समूह पर झपटते समय यह भी ध्यान रखता है कि उसकी हरकतों को मैदान में दर्शक के रूप में बैठे हजारों लोग देख रहे है। उसकी एक गलत हरकत से जीत की उम्मीद हार में बदल सकती है। इसलिए वह अपने जोश के प्रति सजग होकर पूरी ताकत अपनी टीम को जिताने में लगा देता है। राजनीतिक नेता के जयजयकार में जुटी भीड़ कमोबेश ऐसी ही होती है। परंतु यदि राजनेता भीड़ को उकसाने का मार्गदर्शन कर दें तो आवेशित भीड़ मस्जिद जैसे इबादत के स्थलों को भी धूल में मिला सकती है।

हर कोई उकसाने पर आमादा


मीडिया, राजनेता, सामाजिक स्थिति, सोशल मीडिया, जाति व्यवस्था, अमीरी-गरीबी, मालिक-मजदूर, धर्म आदि अनेक विषय ऐसे है जो इंसान के दिमाग में लगातार नफरत के बीज बोये जा रहे है। ऐसे में हर व्यक्ति अपने अंदर लंबे समय तक समाकर रखे क्रोध को कहीं अभिव्यक्त करना चाहता है। वह मौके की तलाश करता है कि कोई कमजोर मिल जाएं तो उस पर अपने क्रोध की तलवार तान दें। अपने गुस्से का सारा लावा उस पर उंडेल दें। परंतु सामाजिक आचरण व सभ्यता की मर्यादाएं उसे ऐसा करने से रोकती है। लेकिन जब मॉब लिंचिंग में उसी क्रोधित व्यक्ति के पहचान भीड़ में खो जाती है तो वह अपने क्रोध के लावे में विवेक खो बैठता है और सारा गुस्सा कमजोर पर उतार देता है। इस दौरान उसे अपराधमुक्त होने का दिलासा भीड़ देती है।

विचार व विवेक पर भावना भारी


इंसान के बर्ताव का आधार उसकी भावना, उसके विचार व विवेक होते है। चूंकि लिंचिंग में विवेक व विचार करने की शक्ति समाप्त हो जाती है तो भावना इन दोनों पर हावी हो जाती है। सामाजिक असंतुलन जहां क्रोध को जन्म देता है, वहीं उसे शांत करने के लिए उपाय तलाशने के बजाय भीड़ से लाभ पाने की चाहत शीर्ष पर बैठे चंद रसूखदारों की नीयत होती है। इसके चलते ही भीड़ के कुकर्मों पर उन्हें बचाने या समर्थन करने की सोच प्रचलित हो चुकी है।


अचानक निर्मम लिंचिंग क्यों बढ़ गई ?


बीते चंद वर्षों में ही देश में 300 से अधिक लिंचिंग की वारदातें घटी है। दंगा एक अलग विषय है। एक शक्तिशाली समूह का अचानक से कमजोर व्यक्ति विशेष पर हिंसक हो जाना यूं ही नहीं घटित हो रहा है। भीड़ को विविध कारणों से न केवल उकसाया जा रहा है, बल्कि अपराध के बाद उन अपराधियों का सत्कार करने जैसे कृत्य खुलेआम घटित हो रहे है। कानून मौन रूप से भीड़ पर सख्त कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। सरकार कौनसे दल की है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कानून को संचालित करने वाली सरकार यदि हिंसक भीड़ को सख्ति से नहीं निपट रही है तो वह अप्रत्याशित रूप से उसका संरक्षण ही कर रही है। अपराधी जब संरक्षण पा लेते है तो वे हत्याएं करने से नहीं घबराते।

…और अंत में


मॉब लिंचिंग की आग अब छोटे गांवों तक सोशल मीडिया के अफवाहों के माध्यम से पहुंच रही है। ताजा मामला एक महिला का है। कुछ 25-30 नंगे पुरुष उस बेसहारा महिला के पीछे दौड़ रहे है। हिंसक हो चुके है। इंसानीयत की कमी से उनकी नग्नता साफ झलकती है। कल को कोई और महिला होगी। आप और हम भी इनके शिकार बन सकते है। नग्न हिंसक जानवर किसी को नहीं छोड़ेंगे। वे आपका मांस नोचेंगे। आपका जीवन जिंदा निगलकर खा जाएंगे। आपका खून पी जाएंगे। ये वही लोग है जो वंदे मातरम का नारा लगाते हुए भारत को तालिबान बनाना चाहते है। इन्हें छोटे-छोटे समुदायों की हो रही तरक्की से नफरत है। समता से द्वेष है। लोकतंत्र के तत्वों से घृणा है। आप बस प्यार कीजिए…सबसे…!

सोचिए…?