पंडिता रमाबाई : क्यो हिंदू धर्म का त्याग कर इन्हे इसाई धर्म को अपनाना पडा - HUMAN

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Saturday, 22 September 2018

पंडिता रमाबाई : क्यो हिंदू धर्म का त्याग कर इन्हे इसाई धर्म को अपनाना पडा




पण्डिता रमाबाई



1870 के आसपास की बात है दक्षिण भारत में एक महिला थी जिनका नाम था पण्डिता रमाबाई। उनके पिता प्रकांड ब्राह्मण एवं संस्कृत के विद्वान थे इसी वजह से पण्डिता रमाबाई भी संस्कृत सीखना चाहती थी चूँकि महिलाओं और शूद्रों के लिए संस्कृत एवं शास्त्रों का अध्ययन वर्जित था इसलिए उन्हें पढ़ने की इजाजत नही मिली लेकिन उनके पिता ने उन्हें घर पर संस्कृत सीखाई और बहुत तीक्ष्ण बुद्धि की शिक्षित बालिका बनाया। जंब यह बात ब्राह्मणों को पता चली तो उन्होंने इस पर आपत्ति प्रकट की और उन्हें पढ़ाने पर रोक लगाई। यह धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध था। लेकिन रमाबाई के पिता ने किसी की न सुनी और रमाबाई भारत की पहली महिला हुई जिन्होंने संस्कृत पढ़ी थी।


उनके समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया। उनसे तमाम सम्बन्ध विच्छेद कर दिए गए। महज 15 वर्ष की उम्र में पण्डिता रमाबाई के पिता की मृत्यु हो गई। बहिष्कृत होने की वजह से कोई उनका अंतिम संस्कार करने तक को राजी नही हुए। रमाबाई ने अपने पिता के शव को धोती में लपेटकर जमीन में दफना दिया। खुद किसी तरह आगे पढ़ने की ठानी और कुछ पैसे जुटाकर विदेश में चिकित्सक बनने चली गई। वहां भी उन्हें उनके ही समाज ने प्रताड़ित करने में कोई कसर नही छोड़ी। लोगों ने उनके पिता की मृत्यु का कारण ही उनके कर्म बता दिये।





एकबार यह बातें स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के संज्ञान में भी आई तो वे उन्हें वेद और शास्त्रों का प्रचार प्रसार करने के लिए सशर्त तैयार हुए लेकिन समाज रमाबाई का मनोबल लगातार तोड़ते ही जा रहा था इसलिए उन्होंने अंत में ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और ब्राह्मण समाज को संतुष्टि हुई कि धर्म भृष्ट होने से बचा लिया गया।


        नीचे तस्वीरों में जिन महिलाओं के हाथों में आप तख्ती देख रहे हैं ये महिलाएं sc, st एक्ट के विरोध में लड़ रही है। उन्हें यही नही पता कि वे पहले क्या है? महिला या ब्राह्मण? क्योंकी महिला तो शुद्र ही है हिंदू धर्म के अनुसार | फिर ये कीस समानता की बात कर रही है | भूल गयी ? ढोर, शुद्र, नारी सब तांडव के अधिकारी |