देवटी की अवधारणा कहाँ से आई है? - HUMAN

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Friday, 7 September 2018

देवटी की अवधारणा कहाँ से आई है?



बुद्ध की ही मूर्ती का हुआ निर्माण विश्व में सर्वप्रथम 


विश्व में जो किसी भी धर्म के किसी भगवान, इंसान या इंसान की शक्ल की तरह यदि कोई पहली मूर्ति बनी थी तो वह बुद्ध की मूर्ति थी। मूर्ति बनाने वालों के पास भी बुद्ध का कोई चित्र, तस्वीर, आकार कुछ नही थी बल्कि लोगों की धारणाओं के अनुसार उनका चित्रण किया गया। जिसमें लंबे कान, पतली आँखे, अनेकों मुद्राएँ आदि थी। बुद्ध के बाद ही बाकी भगवानों और इंसानो की मूर्ति बनाने का दौर चालू हुआ। इस दुनिया में बुद्ध के परिनिर्वाण से पहले कोई मंदिर, विहार, मठ, चर्च, मस्जिद, धार्मिक स्थल नही थे। बुद्ध के अनुयायियों ने बुद्ध की शिक्षा का प्रसार करने के उद्देश्य से मठ-मंदिर और विहारों का निर्माण सर्व प्रथम करवाया था। उसकी देखा देखी में आज आप देखिए धर्म के नाम कितनी इमारतें खड़ी है। जो खुद को प्राचीन से प्राचीन घोषित कर देते हैं चाहे मंदिर या वह जगह15 वर्ष पहले ही अस्तित्व में क्यों न आई हो।


 देवटी की अवधारणा कहाँ से आई है?


देवटी और बौद्ध धर्म का आपसी तालमेल बहुत गहरा है। पहाड़ों में जो भी मंदिर स्थापित है लगभग 700 से 1300 साल पूर्व के ही होंगे जिन्हें हम प्राचीन कहते हैं। लेकिन उनकी शैली बिलकुल बौद्ध परम्परा की तरह है जिसे देवटी नाम दिया गया है। यदि आप चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, भूटान, म्यामार आदि प्राचीन बुद्धिस्ट मंदिरों को देखें तो लगभग पहाड़ी देवटी की तरह ही दिखेंगे। इसका कारण ही यही है कि हमारे पहाड़ों में पहले बौध्द धर्म का बोलबाला था। कबीलों और उनके राजाओं ने यहां अनेकों बौद्ध विहार एवं मठ बनाये थे, धार्मिक उथल पुथल के बाद उन्ही विहार और बौद्ध मंदिरों ने देवटी का स्वरूप ले लिया |


इतिहास


इसका इतिहास बड़ा विचित्र है गांधार कला, हड़प्पा सभ्यता, ब्राह्मी सभ्यता और बौद्दों का पतन, देवटी - मंदिरों का उद्भव और आज का इतिहास इन सबके बीच में बहुत कुछ अदृश्य है और टूटा हुआ है जिसे जो भी जोड़ने का कार्य करेगा उसका परिणाम कुछ और निकल कर आएगा। हमारे पहाड़ों में सबसे प्राचीन मंदिर हनोल स्थित महासू का मंदिर है उसके लिए दावा किया जाता है कि उसका निर्माण पांडवों ने किया था। जबकि प्रसिद्ध रिसर्च स्कॉलर श्री ओसी हांडा जी ने अपने रिसर्च पेपर (किताब) में बहुत पहले ही उसे बौद्ध मंदिर कह चुके है उनका दावा यहाँ तक है कि जिस मूर्ति को वहाँ के लोग महासू देवता समझकर पूजते हैं वह असल में बुद्ध की ही मूर्ति है। उनके दावे के लिए भले ही नए अध्ययन की जरूरत हो सकती है बाकी आप देश विदेशों के प्राचीन बौद्ध मंदिर, मठ और भारत के मंदिर देवटी आदि की विडीयो  देखकर स्वयं आकलन कीजिये।