महार कांफ्रेंस 1936 में बोलते हुए डॉ.आंबेडकर ने : हिंदू धर्म की समीक्षा करते हुये कही थी ये बाते - HUMAN

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Wednesday, 24 October 2018

महार कांफ्रेंस 1936 में बोलते हुए डॉ.आंबेडकर ने : हिंदू धर्म की समीक्षा करते हुये कही थी ये बाते


महार कांफ्रेंस 1936 में बोलते हुए डॉ. भीमराव  रामजी  आंबेडकर ने कहा -


मैंने सदा के लिए इस हिन्दू धर्म को छोड़ने का फैसला कर लिया है। मेरा यह धर्म परिवर्तन किसी भी भौतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं है। शायद ही ऐसा कुछ है जिसे मै अस्पृश्य रहते हुए प्राप्त  नहीं कर सकता हूँ , मेरे धर्म परिवर्तन के पीछे आध्यात्मिक भावना के आलावा और कोई भावना नहीं है , हिंदू धर्म मेरे अंतःकरण  से अपील नहीं करता है। मेरा आत्म सम्मान हिंदू धर्म को आत्मसात नहीं कर सकता है।आपके मामले में धर्म परिवर्तन सांसारिक और आध्यात्मिक सिरों के लिए अनिवार्य है। उन लोगो की मूर्खतापूर्ण राय की परवाह न करे जो कहते है की यह धर्म परिवर्तन केवल भौतिक उद्देश्यो के लिए है , आपको उस धर्म के छत्र के नीचे क्यों रहना चाहिए जिसने आपको आपके  सम्मान, धन, भोजन और आश्रय से वंचित कर दिया है?

मनुष्य के लिये धर्म है, धर्म धर्म के लिये मनुष्य नही 


मैं आपको बतादूँ, धर्म मनुष्य के लिए है मनुष्य धर्म के लिए नहीं है ,यदि आप इस दुनिया में संगठित,  मजबूत  और सफल होना चाहते हैं, तो इस धर्म को बदल दे ,यह धर्म आप को मनुष्य के रूप में नहीं पहचानता है ,न ही आपको पीने के लिए पानी देता है, और न ही आप को  मंदिरों में प्रवेश करने की इजाजत देता है, यह खुद को धर्म कहने योग्य भी  नहीं है | वह धर्म जो आपको शिक्षा प्राप्त करने से रोकता है और आप के  भौतिक प्रगति के रास्ते में आता है वह खुद के साथ "धर्म " लगाने योग्य भी नहीं है।

पशु से भी बदतर मनुष्य 


वह धर्म जो अपने अनुयायियों को अपने सह -  अनुयायियों के साथ  व्यवहार करते वक्त  मानवता दिखाना भी नहीं सिखाता वह शक्ति प्रदर्शन के लावा कुछ भी नहीं है। वह धर्म जो अपने अनुयायियों को जानवरों के स्पर्श को सहन करना  सिखाता है लेकीन मनुष्यों का स्पर्श सहन करना  नहीं सीखता है वह धर्म ,धर्म नहीं मजाक है। वह धर्म जो अज्ञानी को अज्ञानी होने के लिए मजबूर करता है और गरीब गरीब होने के  मजबूर करता है वह धर्म ,धर्म  न होकर केवल एक मुलाकात है।

धर्म के अंतर्निहित में  बुनियादी विचार व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए वातावरण बनाना है। यह स्तिथि में यह आप को यह   स्पष्ट है , कि आप हिंदू धर्म में अपने  " व्यक्तित्व का विकास " नहीं  कर सकते है।

हिंदू धर्म में, विवेक, किसी चीज़ के पीछे के कारण को जानने और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

✍डॉ. भीमराव  रामजी  आंबेडकर