बौद्ध धम्म और पाखंड : तुलना, झूट और सच की - HUMAN

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Wednesday, 17 October 2018

बौद्ध धम्म और पाखंड : तुलना, झूट और सच की

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बौद्ध धम्म और पाखंड 


डॉ. बाबासाह्ब आंबेडकर जी ने हमे १४ अक्तूबर १९५६ को बौद्ध धम्म दिया और इस धम्म के रूप में एक तरह विशालकाय ज्ञान का भंडार ही जैसे परोसा | नही तो मिट्टी से बने मूरत को पुजते बैठना, खुद को कम आखना और सब कुछ भगवान भरोसे छोडना यही सब चल रहा था |

भगवान जातीय अत्याचार नही रोक सकता |
भगवान बलात्कार नही रोक सकता |
नही वो महीलाओ के छल पर कुछ कर सकता है और नही भ्रष्टाचार पर |
भगवान ने पुरी तरह सेल्फफिश अंड फाईट फॉर ओन्ली ऑन हिज लाइफ ऐसे ही बर्ताव किया |

फिर भी ईश्वर को पुजते फिरेंगे 


इसीलिये इन देवताओ को झुटे और झुटी विचारधाराओ को बाबासाहाब जी ने अमान्य ही किया | उनका अस्तित्व नकारा और इस समाज को इन पाखंड से एक भी  खून का छिटा ना बहाते हुये बाहर निकाला , बाबासाहेब ने इन लोगो को इन्सान के रूप में जिना सिखाया | बोलना सिखाया और कहा, मै दिखाता  हु ये बुद्ध | उसको ईश्वर मत समझो, जो कि बुद्ध खुद ही बताता है,..मै जिने की राह दिखाउंगा  | लेकीन मै मोक्षदाता नही हु...! ऐसा ही संदेश देता हुआ अष्टांग मार्ग - पंचशील वो बताता है | जो कि इंसान के रूप में 'जियो और जिने दो' इस रूप में जिने वालो को बुद्ध मान्य होगा | 

ऐसा मानव नही तो यु कहे इंसानियत का विज्ञान पर आधारित धम्म उन्होने अर्थात एक सजीव सोच बाबासाहाब ने हमे दी | वो जिंदा रखी हमने | क्योंकी वो हमे इंसान होणे की याद कराती है | और ये सोच हमे इंसान के भीतर छुपे भगवान को, पशु - पक्षी को प्यार दो यही सिखाता है |


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पत्थर को पत्थर, मिट्टी को मिट्टी कहने की बुद्धी 


बुद्ध कि सोच हमे पत्थर को पत्थर और मिट्टी को मिट्टी कहने की भी बुद्धी प्रदान करता है | नही तो अल्लाह के नाम पर पुरे अपने शरीर को जखमी करे, ईश्वर के नाम पर हार पहनकर, देवी के नाम पर हंटर के फटके खुद के शरीर पर मारो और दरदर भटकते हुये भिक मांगे ऐसे जीवन का त्याग हमने किया है | 

    इंसानो को एकसूत्र में बांधणा हो तो इंसानियत के  धर्म और सच्चे सोच का उपयोग होणा चाहिये | नही तो जहा ईश्वर खुद अपने मन्दिर तकभी खुद नही जा सकता फिर भी मिट्टी से बने मुरत के दर्शन हेतू इतनी लंबी कतार लगी रहती है, लेकीन इंसान को अभी भी मिट्टी के मोल जितना समझा जाता है उस इंसान को नकारने वाले धर्म को और उस धर्म को बढाने वाले त्योहारो को  कितना भी मनाओगे तो भी फिजूल ही होगा | उन त्योहारो से सिर्फ धर्म को बढावा मिलेगा इंसानो का क्या ? धर्म का केंद्र इंसान ही नही होगा तो उसके त्योहारो का क्या फायदा ? 

इंसान के लिये धम्म उपयोगी 


इंसान के लिये धम्म उपयोगी है | धम्म कि विचारधारा महत्वपूर्ण है | नही तो इस धर्म का स्वीकार कर देश ने पहले भी गुलामी का स्वीकार किया और अभी भी कर रहा है | ऐसा ही चलता रहा तो धर्म के नाम पर दंगे करके अपनी वोट बैंक जमा कर राजकारण खेलने वाले और लुटणे वालो कि गुलामी हि देश के मथ्थे होगी | 

अब वो बिना बेस वाले उत्सव, वो धर्म या इंसानियात की जरुरत नही | इसके बारे में लोगो ने सोचना है | हमने उन्नत बौद्ध धम्म का और विज्ञानवादी सोच का जतन करनेवाले जिस आंबेडकरी आंदोलन के जिस  मार्ग को नियुक्त किया वो अब कभी भी कही भी इस पाखंड की राह को नही छु पायेगा | नही वो खत्म होगा जब तक इंसान है | जिनको विकास चाहिये वो आये ..! राह खुली है | 

***जय भिम***