कौन था कनिष्क? : बौद्ध धर्म,साहित्य,कला और सम्राट कनिष्क - HUMAN

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Saturday, 20 October 2018

कौन था कनिष्क? : बौद्ध धर्म,साहित्य,कला और सम्राट कनिष्क

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भारत के इतिहास के अनेक सुवर्णपन्ने है और ये ऐतिहासिक बाते हम अभिमानपूर्वक जतन कर रखते है | लेकीन समय के बहाव में ये नाम स्मरण नही रहते या इतिहास के किताब में बंदिस्त होकर रह जाती है | उसी में से एक नाम राजा कनिष्क | बाहर से आये थे लेकीन यहा के लोगो में घुल मिलकर भारतीय बन चुके थे ऐसा वर्णन जिनका किया जाता है उन्ही मे से एक मतलब कुशाण ! उस कुशान साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक मतलब राजा कनिष्क |

कौन थे कुशान ?


आज का पश्चिमी चीन का प्रांत ये यूएची टोल के प्रांत के रूप में पहचाना जाता है। पशुपालन मुख्य व्यवसाय इनका था। आगे ये स्थलांतरित होती गयी और शासक के रूप में स्थिर हुयी वो बॅक्ट्रिया इस जगह।इस प्रदेश को आज हम मध्य एशिया के रूप में पहचानते हैं।

आगे हिंदुकुश पर्बतीय कतार, अफगानिस्तान, ताजीकिस्तान, दक्खिनी उझबेकिस्तान यहा से सीधे भारत में गंगा के  सुपीक भूभाग तक, मथुरा, पाटलिपुत्र यहा तक विस्तार हुआ। इतने  बडे भूभाग पर अधिपत्य  होते हुए भी वह साम्राज्य पद्धति अनुसार कार्यभार नही कर रहे थे।

कुछ हिस्से में उनकी सीधी सत्ता थी तो अन्य प्रदेश क्षत्रपो के हाथ थी। कुछ राजाओं ने कुषाण का स्वामित्व मान्य किया तो कुछ राजा ओ की तरफ से सत्ता की जाती थी।

राजा कनिष्क की करकीर्द


इसा 127 से लेकर 150 ये राजा कनिष्क का कार्यकाल का वक्त हैं। इतिहास तज्ञो में इसपर दुमत था लेकिन अब नए सामने आये तथ्यों के अनुसार इसी समय पर सहमती मिलती है। इसके अलावा राजा कनिष्क एक ही हो गया या अनेक इसपर भी विवाद शुरू हैं। इस वजह से राजा कनिष्क और राजा कनिष्क प्रथम इस नाम से भी उल्लेख मिलता है।

इतने बड़े तौर पर विस्तारित इस साम्राज्य की राजधानी गांधार प्रदेश की पुरुषपुर (अब का पेशावर) थीं। उसी के साथ कापिसा ( अब का बाग्राम, अफगानिस्तान) और मथुरा ऐसी दो राजधानियां थीं।

सम्राट कनिष्क का चीनी शासक से युद्ध


हान राजवंश का इतिहास ( मूल चीनी नाम-Hou Hanshu) इस किताब में बान चाओ(Ban Chao) ये सैनिकी अधिकारी खोतान के पास लड़ने के उल्लेख है। यहाँ 70,000 कुषाण सैनिको कि लडाई के चीनी कागजो में नमूद हैं। काशगर, यार्कद, खोतान ये अभी का चीन में समाविष्ट प्रांत कुषाण के वर्चस्व के नीचे आया।

जहा सम्राट कनिष्क एक बार पराजित हुआ, फिर पुनः जीता।आगे वह प्रदेश कुषाणों के हाथों से फिर से गया। वहा कनिष्क काल समय के अनेक सिक्के मिले हैं। इससे इन दो प्रांतों के आंतरसंबंध पता चलते हैं।
दक्खिनी एशिया और रोम इनके बीच की जमी(रेशिम मार्ग) और समुंदर इनके राह पर नियंत्रण करना कनिष्क के मुख्य उद्देशों में से एक था।

कनिष्ककालीन सिक्के


शुरू के समय ग्रीक भाषा औए लिपी वाले सिक्के से आगे ईरानी बॅक्ट्रियन भाषा के सिक्के और अल्प संख्या में बुद्ध इनकी प्रतिमा वाले सिक्के प्रचलित थे। ये सिक्के उनके विविध धार्मिक प्रथाओं का समन्वय रखने वाली दिखती हैं।  सिक्के सोने और ताम्र के हैं। इसमें मे से कुछ ब्रिटिश संग्रहालय में देखने मिलते हैं तो अफगानिस्तान में तालिबानी हमले में वहा के संग्रहालय नष्ट होने के कारण जतन करके रखे हुए सिक्के नामशेष हुए हैं।


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सोने का सिक्का; कनिष्क साथ बुद्ध समय 128-150 सीई


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सिक्का; कनिष्क साथ बुद्ध समय  128-150 सीई 



सम्राट कनिष्क और बुद्धधर्म


सिर्फ बुद्ध धर्म का उपासक इतनी ही सम्राट कनिष्क की पहचान नहीं है तो इस धर्म के प्रति अभ्यासकों को प्रोत्साहित करने में वे अग्रेसर थे। चौथी बौद्ध धर्म परिषद कुंडलवन, कश्मीर यहां आयोजित की करने में कनिष्क का योगदान था। वसुमित्र यह इस परिषद के प्रमुख तो अश्वघोष ये उपप्रमुख थे। इस परिषद के बाद बुद्ध धर्म हीनयान और महायान इन दो हिस्सों में विभाजित हुआ।

पेशावर यहा स्थित कनिष्क स्तूप यह बौद्ध परंपरा के वास्तुशैलि में बनाया गया स्तूप ये भी एक बड़ा योगदान है।सम्राट कनिष्क ये बुद्ध तत्वज्ञ अश्वघोष इनके निकट थे। आगे अश्वघोष सम्राट कनिष्क के धार्मिक सल्लागार बने। सम्राट कनिष्क और सम्राट अशोक इनकी बौद्ध धर्म में योगदान के संदर्भ में तुलना की जाती हैं।

बुद्ध परंपरा में सम्राट कनिष्क


बुद्ध साहित्य में ऐसा कहा जाता है कि कनिष्क बहुत ही कठोर और क्रोधित राजा थे,लेकिन बौद्ध धर्म के स्वीकार कर ने के बाद वे बदल गये। आगे उन्हें बड़ा मान सम्मान मिला। 'महाराजधिराज' इस विशेषण से वे नामांकित हुए। ये बिरुद लेकिन पर्शियन, चीनी, रोमन परंपरा से आया।

बुद्ध धर्म का चीन में प्रसार


सम्राट कनिष्क के चीनी शासकपर विजय के पश्चात बुद्ध सन्यासियोने व्यापारियो के साथ धर्मप्रचार के लिए रेशिम मार्ग द्वारा चीनमें प्रवेश किया। इसकी परिणीति के रूप में आगे बुद्ध सन्यासी लोककसेमा इन्होंने महायान बुद्ध ग्रंथ का चीनी भाषा में अनुवाद किया।

आगे चीनी यात्री बुद्ध ग्रंथ के खोज में भारत आने लगे। उसके लिए मुख्यतः कुषाण प्रांत से वे सफर करते।


 वर्तमान में सम्राट कनिष्क


 सम्राट कनिष्क के मृत्यु के बारे में कोई ठोस जानकारी मौजूद नहीं है।सम्राट कनिष्क के एक शिलालेख का अवशेष बीसवी सदी के शुरवाती दौर में मिला था और अब वो पेशावर के संग्रहालय में है। आज कश्मीर में कनिष्कनगर नही है लेकिन बारामुल्ला के पास अनेक स्तूप दीखते हैं।अफगानिस्तान में तालिबानी अतिरेकी द्वारा संग्रहालय नष्ट किये गए हैं।

ठोस जानकारी की कमी होने के बावजूद भी, सम्राट कनिष्क के शासन के परिणाम भारत, चीन और मध्य एशिया के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में दिखाई पड़ते हैं। उनके समर्थन के कारण महायान बौद्ध धर्म का प्रसार हो सका जिसकी वजह से धर्म के लिए एक मजबूत निव खड़ी हो सकी।

हो सकता है हमारे सामने सम्राट कनिष्क के जीवन की सभी चित्र कभी सामने ना आये।लेकिन उन्होंने अपने जीवन में दिखाई देनेवाले असंख्य कलात्मक और वास्तुशिल्प की कलाकृती साथ ही अनेक संस्कृती और विचारो पे निर्भर परंपरा और मूल्यों की जानकारी दी।

आज भी रेशिम मार्ग का महत्व उतना ही है और उनमें से कुछ भूभागों पर राज्य करनेवाले इस सम्राट को भूलना नामुमकिन है।