जब धर्मांतरन हुआ ... - HUMAN

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Monday, 22 October 2018

जब धर्मांतरन हुआ ...

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जब धर्मांतरन किया ....


हमारे बाप जादाओ ने, 1956 को दीक्षा ली। उस समय मनुवादी सोच अपने चरम सीमा पर थी। लोगो में अंधविश्वास, ईश्वर पर अंधी आस्था, कुछ गलत घटित होगा तो देव क्रोधित होगा, परिवार नस्तनाभूत होगा ये डर हर एक के मन में जड़ तक घर कर बैठा था। खेती के लिए दूसरों पर निर्भर, मजदूरी के लिए दूसरों पर निर्भर। नैसर्गिक प्रकोप से कभी कभी पहले से ही खंडनी पर ली हुई खेती भी नस्तनाभूत हो जाती।

पास पास सभी का जीना औरो पर निर्भर। लेकिन इतना होकर भी उन भोली जनता ने बाबासाहब को आदर्श मान बौद्ध धम्म की दीक्षा ली ओ भी 22 प्रतिज्ञा का उच्चार करते हुए। मतलब पुराने रिती रिवाज, प्रथा, परंपरा,भगवान, यज्ञ  इन कल्पनाओं को अपने समाज-वाड़ी से हद्दपार कराने की हिम्मत की।

स्वाभिमानी, प्रामाणिक पुरखे 


उसके बाद गांव में बहुत ही हलचल हुयी। हिंदू धर्म का एक बड़ा हिस्सा बाहर निकला। जमीदार, किसान, मानकरी व्यक्ती  दूसरे धर्म में गया इसीलिए ब्राम्हणी आक्रोश शुरू हुआ। जिनको हमारा परिवर्तन अमान्य था वे अपने लोगो पर आरोप करने लगे। पंचायते हुयी, सामाजिक बंधन लादे गये, चाकरी छूटी, घर में काम से रखने  वालो को भी बंद किया गया और जो खेती भी खंडणी पर दी गयी थी वो भी छीन ली गई। कल्पना कीजिये पहले से ही सबके सब गरीब। खाने के लाले पड़े हुए थे। निसर्ग की भी साथ नही उसमे काम भी बंद। फिर उन लोगो ने मतलब अपने माता पिता ने, दादा-परदादा ने क्या सोचना चाहिए था?


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आदर्श, पुरा विश्वास डॉ.बाबासाहाब आंबेडकर पर


लेकिन ये लोग अज्ञानी होते हुए भी उनके पीछे एक महामानव खड़ा था। उनको आदर्श मान लोगो ने भगवान को शिक्षा में तलाशना शुरू किया। ईश्वर को नोकरी में खोजा। सम्यक आचरण कर लोगो ने खुद का भविष्य वैचारीक क्रांति में खोजना शुरू किया और पत्थर - कल्पना के ईश्वर को अपने जीवन से तड़ीपार किया। क्या हिम्मत वाले इंसान होंगे वो? उस धैर्य के साथ उनको बाबासाहब के विचारों की जो समज आयी थी, वो आकलन शक्ती ही अद्भुत और प्रगल्भ थी। देवो को नदी में बहाया, गणपती घर लाना बंद किया, दिवाली बंद, होली बंद मतलब अपने पूर्वज तो पूरी तरह बर्बाद हो जाणे चाहिए थे ना? भगवान के प्रकोप से उनको नष्ट  ही हो जाना चाहिए था। लेकिन इन लोगो पर भगवान क्रोधित होने के बजाय उलटा उनका विकास ही हुआ। शिक्षा ली, नोकरी मिली, बच्चे बड़े बने, समाज में अलग स्थान, प्रतिष्ठा मिली, विचारमंच मिला।

वही अगर सिर्फ महार बनके रहते और महारकी करते बैठते, इसी जाती में भागीदारी करते बैठते, मजदूरी के लिए गांव पर निर्भर रहते तो ?  लेकिन उन अशिक्षित लोगो ने एक कठोर सख्त कदम उठाया और पूरा सिस्टम ही बदल डाला।



वर्तमान स्थिती 



लेकिन अब के सुशिक्षित युवक दुबारा उसी राह पर चल पड़े हैं, जिस राह को अपने पूर्वजो ने दुत्कारा। क्यों करते हैं ये युवक ऐसा? ईश्वर क्रोधित होगा इसलिए डरते हैं क्या? या सिर्फ फॅशन के लिये करते हैं? या जिस समाज को हमारे जीवन की बिलकुल भी परवाह नहीं थी उसको खुश करने के लिए बाबासाहब के विचारों से बेईमानी करते हैं? या धम्म का तत्वज्ञान अच्छेसे आकलन ना कर सके इसलिए? ये सोचनेवाली बात है।

एक बात लेकिन पक्की, अब की युवा पीड़ी अगर भगवान से डरती है तो वो बेवकूफ मुर्ख होगी। जिसका अस्तित्व ही नहीं ऐसे कल्पित देवो के त्योहारों का जयकारा, वाहवाही करके उन पूर्वजो के पुरोगामी सोच को आवाहन दे रही हैं तो उनकी शिक्षा सिर्फ नोकरी ढूंढने तक और चैन विलास में रममाण होने के लिए ही होगी।

आज की पीढ़ी ये तर्क चिकित्सा करने में कम पड़ रही हैं। खुद क्यों? किसलिए? ये सवाल खड़े नही कर सकते। और जो तर्क की कसोटी पर नही सोच सकता वो बौद्ध हो ही नहीं सकता।