माहवारी के वक्त मंदिर में जाणे की जिद क्यो ? : स्मृती ईराणी - HUMAN

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Wednesday, 24 October 2018

माहवारी के वक्त मंदिर में जाणे की जिद क्यो ? : स्मृती ईराणी




केरला का प्रसिध्द सबरीमाल मन्दिर महिलाओ के लिये खुले करणे के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पुरे भारतभर में तीव्र प्रतिक्रिया दिख ही रही है की, स्मृती ईराणी के इस वक्तव्य ने एक और विवाद को जन्म दे दिया है | उसके मुताबिक 'माहवारी के वक्त जब हम अपने दोस्त के घर नही जा सकते तो मंदिर मे जाणे की जिद क्यो? ' ऐसा वक्तव्य कर उन्होने एक तरीके से औरतो को मंदिर मे प्रवेश ना करणे देणे के फैसले का समर्थन ही किया है|

क्या थी घटना ?


केरल के शबरीमाल मंदिर में औरतो को प्रवेश नही करणे दिया जाता | ये रिवाज सेकडो सालो से चल रहा है | इस पुराणी प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दि गयी थी | पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश दीपक मिश्रा इनके अध्यक्षता के नीचे पाच सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले में अंतिम सुनवाई की | न्यायालय द्वारा मन्दिर में प्रवेश हेतू सभी निर्बंध दूर किये और प्रवेश की अनुमती दी | लेकीन इसके बावजुद रूढीवादी लोग संघटनाये महिलाओ को प्रवेश करणे से मना कर रहे है | पिछले बुधवार को मन्दिर के दरवाजे खुले करणे के पश्चात वहा महिलाओ को प्रवेश करणे से मना किया गया |


स्मृती ईराणी का वक्तव्य 


जब हम माहवारी के वक्त अपने दोस्त के घर खून से लदे सॅनिटरी पॅड लेकर नही जाते तो उस वक्त मन्दिर में जाणे की जिद क्यो? मन्दिर में जाणा वहा दर्शन करणा सभी का हक है लेकीन वहा जाते वक्त हमने अपने स्वविवेक का इस्तेमाल करणा चाहिये ऐसी प्रतिक्रिया स्मृती ईराणी ने व्यक्त की | ब्रिटीश डेप्युटी हाय कमिशन और आब्झर्व्हर्स रिसर्च फाउन्डेशन की तरफ से आयोजित कि गये चर्चासत्र में स्मृती इराणी बोल रही थी |

लेकीन अपने इस वक्तव्य के बाद महिला वर्ग की तरफ तीव्र विरोध हो सकता है, ये सोचते हुये उन्होने मेरे  एक विद्यमान कॅबीनेट मंत्री होणे के नाते सुप्रीम कोर्ट के इस फैसलेपर कुछ भी बोल नही सकती, ये जो भी मै रही हु ये मेरा निजी मत है ऐसा कहते हुये उन्होने मामले को समेटने की कोशिश की|

किया निजीगत अनुभव साझा 


उसके लिये उन्होने अपना एक निजी अनुभव भी बताया,..

' मै एक हिंदू हु और एक पारसी इंसान से शादी की | अपने बच्चो को मै झोराष्ट्रीयन परंपरा सिखा रही हु| जब मै अपने नवजात बच्चे को लेकर अंधेरी के अग्यारी में गयी तब मेरे बच्चे को मैने अपने पती की तरफ दिया | क्योंकी वहा मुझे यहा खडे मत रहो ऐसा बताया गया  | मेरे पती मेरे बच्चे को अग्यारी में ले गये क्योंकी पारसी धर्मीय लोगो के अलावा वहा कोई भी जा नही सकता ऐसा नियम ही है | उस नियम का पालन मैने किया | आज भी मेरे पती और बच्चा अग्यारी में जाते है, तब मै रास्ते पर या कार में उनका इंतजार करती हु|

अब ऐसे मंत्री जो खुद गलत रीवाजो, धारणाओ का समर्थन करते है उनसे अपने लिये न्याय की अपेक्षा करणा मूर्खता ही होगी |