बालासाहाब आंबेडकर ने वंदेमातरम कहने से क्यो इन्कार किया? : जाणिये वजह - HUMAN

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Saturday, 27 October 2018

बालासाहाब आंबेडकर ने वंदेमातरम कहने से क्यो इन्कार किया? : जाणिये वजह


वंदे मातरम का इतिहास 


वंदेमातरम् ये गीत बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा लिखित है | बंकिमचंद्र चटर्जी ये अंग्रेजी कार्यालय में डेप्युटी कलेक्टर के रूप में कार्यरत थे| अंग्रेजो के नोकर द्वारा रचित ''वंदे मातरम'' गीत और रवींद्रनाथ टागोर द्वारा रचित ''जन गण मन'' इन दोनो गितो में से कौनसा राष्ट्रीय गीत होणा चाहिये ऐसा विवाद जारी है अभी तक ! 

बंकिमचंद्र चटर्जी इन्होने वंदेमातरम् यह गीत ७ नवम्बर १८७६ को लिखा और 1882 को उन्होंने इसका समावेश अपने "आनंदमठ" इस कादम्बरी में किया।

आनंदमठ ये कादम्बरी किसपर आधारित हैं?

आनंदमठ यह कादम्बरी धर्मवादी विचारो पर आधारित हैं। कादम्बरी ने मुस्लिम विरोधी धार्मिक द्वेष लोगो के मन में निर्माण करने का काम किया है, ऐसा मानना उस वक्त से मुस्लिम सामुदायिक नेतृत्व के लोगो का है | वंदेमातरम् यह गीत आजादी से अनेको अधिवेशन में गाया गया और इस गीत को मुस्लीम समुदाय ने शुरवाती दौर से ही विरोध किया है |

ये विवाद खत्म करणे के उद्देश्य से पंडित जवाहरलाल नेहरू इनके अध्यक्षता के नीचे एक समिती २७ अक्तूबर १९३७ को गठीत की गयी | उस समिती में मौलाना अब्दुल कलाम आझाद, सुभाष चंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव ये जनमान्य प्रतिनिधी थे | इस समिती ने ऐसा अहवाल सादर किया की, वंदेमातरम् इस गीत में शूरवात के पंक्तियो  में, देश का वर्णन है और शेष पंक्तियो में हिंदू देवी देवताओ की प्रशन्षा है | इस वजह यह राष्ट्रगीत नही हो सकता |

जब सवाल खडा हुआ था भारत का राष्ट्रगान कोनसा होणा चाहिये ...


उसके बाद जब प्रश्न उपस्थित हुआ स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान कोनसा होणा चाहिये तब संविधान सभा के २६० खासदार द्वारा ''जन गण मन'' ये रवीन्द्रनाथ टागोर द्वारा रचित गीत राष्ट्रगान के रूप स्वीकृत किया | क्योंकी भारत ने सर्वधर्म समभाव का स्वीकार किया है | इसलिये राष्ट्रगीत किसी भी धर्म की प्रशन्षा करनेवाला नही होणा चाहिये इस विकल्प को चुना गया | 

संविधान के कलम ५१ (ए) में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है की, राष्ट्रीय गीत के रूप में ''जन गण मन'' और राष्ट्रीय ध्वज ''तिरंगा ध्वज'' ये प्रतिक है |  

देश के आजादी के बाद और संविधान में स्पष्ट रूप से लिखित होणे के बावजुद भी भाजपा और आरएसएस के लोग इस गीत के लिये आग्रही भूमिका लेते आ रहे है | उन्होने अपनी कोशिशे नही छोडी | 


सुप्रीम कोर्ट के निर्देश 


हाल ही में सुप्रीप कोर्ट के न्यायाधीश दिपक मिश्रा इनके सामने भाजपा के प्रवक्ता अश्विन उपाध्याय इन्होने याचिका दाखल कर सरकार की तरफ से  ''वंदे मातरम'' इस गीत के प्रचार हेतू धोरण निश्चित किया जाये ऐसी मांग की थी | इस याचिका पर सुनवाई करते वक्त दीपक मिश्रा इनके अध्यक्षता के नीचे सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा निर्णय दिया है की, ''वंदेमातरम्'' इस गीत का कलम ५१ (ए) में उल्लेख नही याने ये दुसरे दर्जे के रूप के गीत में देखा जायेगा | राष्ट्रीय गीत के तौर पर जन गण मन को मान्यता है | 

१८७३ से लेकर अब तक का घटनाक्रम 


१८७३ से लेकर अगर अब तक का इतिहास देखा जाये तो ऐसा स्पष्ट होता है की, वंदे मातरम इस गीत को मुस्लीम समाज, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अब्दुल कलाम आझाद, आचार्य नरेंद्र देव और रवीन्द्रनाथ टागोर इन्होने विरोध किया | संविधान सभा के २६० खासदारो ने नकारा | और विशेष उल्लेखनीय मतलब देश के सुप्रीम कोर्ट ने नकारा | 

इसीलिये कोई देशप्रेमी इन्सान कभी भी संविधान और देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अपमान नही करेगा |