जब नही थे माता रमाई के पास दुध खरीदणे के लिये पैसे : जाणिये वो करूनदेय किस्सा - HUMAN

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Saturday, 27 October 2018

जब नही थे माता रमाई के पास दुध खरीदणे के लिये पैसे : जाणिये वो करूनदेय किस्सा

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जब रमेश बिमार था 


        डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के बच्चो कि  बीमारी में पैसे ना होने के कारण उपचार के अभाव में उनका मृत्यू हुई। जब रमेश छोटा था तब  बाबासाहब विदेश में पढ़ रहे थे। रमाई गोबर इकठ्ठा कर उसके उपटे बनाती और बेचती और उसपर घर का खर्चा होता। उस वक्त पैसो की बहुत ही कमी रहती ।रमाई  उसी पैसो में घर चलाती और उसमें से बाकी बचाके बाबासाहब को भेजती। जब रमेश बीमार था तब रमाई के पास दवा के लिए पैसे नही थे। रमाई भी भूखी थी। आई रमा ने पड़ोस के एक लड़के को उधार पर दूध लाने भेजा। दुकानदार ने उधार दूध देने से मना किया। रमाई घर में कुछ खाने के लिए तलाशने लगी।सभी बर्तन खोज निकाले। लेकीन सब के सब खाली थे | फिर एक बर्तन में थोड़ी उड़द की दाल मिली। भूखी होने के कारण बच्चे को पिलाने के लिए दूध नही आ रहा था। रमाई ने वो उड़द की दाल भिगोके खाई। लेकिन रमेश कि  पिने के लिए दूध ना होने के कारण मौत हो गयी।


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राजरत्न का करूनदेय मृत्यू 


बाबासाहब का दूसरा प्यारा बच्चा राजरत्न इसको निमोनिया हुआ था। उस समय बाबासाहब कोर्ट में केस लड़ने के लिए गए थे। बाबासाहब का वो पहला केस था ।बाबासाहब को खबर भेजी गई की राजरत्न बहुत बीमार हैं। बाबासाहब घर आये राजरत्न को सीने से लगाया । राजरत्न को बहुत ही तेज बुखार था। तब उसके इलाज के लिए बाबासाहब के पास पैसे नही थे। बाबासाहब के गोदी में ही उसकी मौत हुई। उसके अंतिम संस्कार के लिए नए कपड़े लाने के लिए लोगो ने बाबासाहब से पैसे मांगे। बाबासाहब चुप थे कुछ भी ना बोले। रमाई समझ गयी की बाबासाहब के पास पैसे नहीं है। रमाई ने साड़ी का पल्लू फाड़ उसमे राजरत्न को लपेटा।और उसका अंतिम संस्कार किया।

हमारी जिम्मेदारी 


देखो दोस्तों जब अपने बच्चों को सुई भी चुभोति है तो हम आज सह नही पाते । आलिशान मकानों में रहते हैं। साफ सुथरे कपड़े, पाणी सब कुछ, सभी ऐशो आराम आज हमारे कदमो में हैं।इज्जत सम्मान की जिंदगी मिली। इन सबके पीछे आई रमाई और बाबासाहब के अनगिनत ऐसे त्याग हैं।
 कुर्बान कर दिए अपने सभी सुख हमारे लिए ताकि हमारे सभी दुःख सुख में बदल जाये। उनके इन एहसान का कर्ज उतारना है हमे । शिक्षित,संघटित होके संघर्ष कर। अंधविश्वासों से मुक्त सोच को करके। मनुवादी सोच को पराजित करना है उसके लिए समाज के हर एक व्यक्ति ने कोशिश करनी चाहिए।यही बाबासाहब के लिए हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।