येशू ख्रिस्त गौतम बुद्ध के भिख्खु : BBC के डॉक्युमेंट्री का निष्कर्ष, जाणिये विस्तार से - HUMAN

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Wednesday, 21 November 2018

येशू ख्रिस्त गौतम बुद्ध के भिख्खु : BBC के डॉक्युमेंट्री का निष्कर्ष, जाणिये विस्तार से




इतिहास का अध्ययन कर संशोधनकर्ता नये तथ्य, निष्कर्ष हमारे सामने रखते है | इसी के चलते BBC ने  अपनी डॉक्युमेंटरी के जरीये ये निष्कर्ष निकाला है कि,'' येशू ख्रिस्त भारत में रह चुके गौतम बुद्ध के भिक्खू थे | '' येशू ख्रिश्त से जुडी अनेक कथा दंतकथाये प्रचलित है |'' उन्होने समस्त दुनिया को प्रेम, शांती, करुणा का संदेश दिया ऐसा ख्रिस्ती लोग मानते है |'' येसू ख्रिस्त तकरिबन सभी ख्रिश्चन लोगो के श्रद्धास्थान है |


                     जीजस ऑफ नाझरेथ के रूप में 
                     प्रसिध्द येशू ख्रिस्त का जन्म 
                     पॅलेस्टाईन के बेथलेहेम यहा हुआ था ...


*उनके उम्र के तेरा साल से लेकर उनतीस साल तक वे कहा थे इसका बायबल में या पश्चिमी मिडल इस्टर्न इतिहास में कुछ भी रेकॉर्ड नही मिलता है |

येशू ख्रिस्त के जीवन के इस सोला साल को ''द लास्ट इयर्स '' ऐसा कहा जाता है | इस सोला साल के समय येशू ख्रिस्त कहा रहते थे, या कोनसा कार्य कर रहे थे ये १८८७ तक एक रहस्य ही था | बाद में १८८७ में इसके संदर्भ में एक सिद्धांत रखा गया | १९ वी सदी के अंत में निकोलस नोतोवीच इस रशियन डॉक्टर ने पुरे भारत, तिब्बत, और अफगाणिस्तान का दौरा किया | इस सफर में आये अपने अच्छे बुरे अनुभव उसने अपने बुक ''द अननोन लाइफ ऑफ ख्राईस्ट '' में साझा कर रखे है | ये बुक १८९४ साल में पब्लिश किया गया था |

ये सफर करते वक्त १८८७ को नोतोवीच के पैर को गहरी चोट पहुची | तब वे कुछ समय तक लेह के एक हेमिस बुद्ध मठ में स्थित थे | इसी मठ में उन्हे बौध्ह भिख्कू ने दस्तऐवज दिखाये | 

ये दस्तऐवज तिब्बत भाषा में थी और उनपर शीर्षक था 
- ''संत इसा इनकी जीवनगाथा''


नोतोवीच जब इस मठ में रहे तब उन्होने इस दस्तऐवज का भाषांतर किया | इसमे जीजस याने (परमपिता का पुत्र - इसा) नाम के छोटे बच्चे कि कहाणी बतायी गयी है | ये लडका प्रथम शताब्दी में इस्राएल के गरीब परिवार में जन्मा था |


येशू ख्रिस्त को उनके उम्र के 
१३ साल से लेकर २९ साल तक 
वैदिक पण्डितो ने प्राचीन पवित्र 
बौध्ह ग्रंथो में से ज्ञान दिया था और 
उन्होने येशू ख्रिस्त को ईश्वर का पुत्र 
ऐसा कहा था, ऐसा नोतोवीच को दिखा ......







उन्होने इस ग्रंथ के २२४ श्लोक में से २०० का भाषांतर किया | जब 1887 में उस मठ में नोतोविच था, तो एक लामाने  ने नोतोविच को जीजस  को प्राप्त हुये परमज्ञान के बारे में बताया। लामाने  नोतोविच को बताया कि
"यीशु महान प्रेषित था। यहा के बाईस बौद्धों में से वो एक था। वे  लामा से भी बड़े हैं क्योंकि उनमें भगवान का अंश है। उन्होंने आपको ज्ञान भी दिया है, और उन्होंने हर व्यक्ति को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने के लिए सिखाया है। उनके नाम और उनके काम का वर्णन हमारे पवित्र ग्रंथों में किया गया है। उनके कार्य के बारे में पढते वक्त हम बंडखोर और विचलित करनेवाले वाले लोगो में जा पहुचे | पेगम लोगो ने जो उन्हे पीडा दी, उन्हे मृत्यूदंड देणे का जो महाभयंकर पाप किया है वो पढकर हम रोये |

नोतोवीच इनके सिद्धांत अनुसार ,

यीशु ख्रिस्त भारत में रह चुके है, इस बात का संशोधन ये द लास्ट इयर्स से बारकाई से मिलता है | साथ हि उनका जन्म मिडल इस्ट में ही क्यो हुआ इसका भी कारण इस बात से पता चलता है | 

जब एक महान बुद्ध या लामा जैसे पवित्र इंसान के जीवन का अंत होता है तब होशियार आदमी ग्रह, तारो और भी बाकी संकेतो के माध्यमो से लामा के पुनर्जन्म हुये शिशु को ढुंढते एक बडे सफर को निकल पडते है |  जब बच्चा बडा होता है तब उस बच्चे को उनके माता पिता से दूर ले जाकर बौध्ह धर्म से संबधित ज्ञान दिया जाता है | 

जाचकर्ताओ के मुताबिक यही द थ्री वाईज मेन इस कहाणी का बेस है | ऐसा माना जाता है कि यीषु ख्रिस्त जब तेरा साल के हुये तब उन्हे भारत लाया गया और बौध्ह मान उन्हे बौध्ह धर्म का ज्ञान दिया गया | इस काल में बौध्ह धर्म ५०० साल पुराना था तो ख्रिश्चन धर्म की शुरवात भी नही हुई थी | 

IANS इस न्यूज एजन्सी को एक प्रोढ लामा ने बताया, 

'' ऐसा कहा जाता है कि यीशु ख्रिस्त अपने भारत देश आये 
   और काश्मीर में बौध्ह धर्म का ज्ञान दिया गया | बुद्ध का ज्ञान 
   और नियम इससे यीशु ख्रिस्त को प्रेरणा मिली |''



इस कहानी कि पुष्ठी दृकपा बुद्धिस्ट सेक्ट के मुख्य साथ ही हेमिस मठ के मुख्य ग्वाल्याग्न दृकपा ये भी करते है | इस २२४ श्लोक कि जाच बाकी लोगो ने भी कि है | रशियन तत्त्वज्ञाता और शास्त्रज्ञ निकोलस रोरीच इसने १९५२ को यीशु ख्रिस्त इस मठ में मुक्कामी थे ऐसा नमूद किया है | वे लिखते है कि ....

''यीशु ख्रिस्त वाराणसी जैसे भारत के अनेक प्राचीन शहरो में 
रह चुके है | सभी लोग उनसे प्यार करते थे क्योंकी वे शुद्र और 
वैश्य इनसे करुणा के साथ पेश आते | साथ यीशु ने उनको मार्गदर्शन 
और मदद भी की|''


यीषु ख्रिस्त ने भारत के जगन्नाथ पुरी, वाराणसी, राजगृह इन शहरो में पढाने का कार्य भी किया था जिस वजह से उच्चवर्ण लोगो के गुस्से का सामना भी उन्हे करणा पडा था | 

इसलिये वे फिर हिमालय गये और छे साल  उन्होने वहा बुद्ध धर्म का ज्ञान हासील करणे में व्यतीत किये | हॉलजर केस्टर्ण इस जर्मन जाचकर्ता ने भी इस सिद्धांत कि पुष्टी कि है | उन्होने जीजस लिव्हड इन इंडिया ये किताब लिखी है | इस किताब ने उन्होने यीशु ख्रिस्त के शुरवात के समय के बारे में लिखा है, उन्होने लिखा है क

'' ये लडका व्यापारी लोगो के साथ सिंधू नदी के 
समीप सिंध प्रांत में आया | वहा वो आर्य लोगो 
के साथ रहा क्योंकी उसे खुद में सुधार करणा 
था | साथ ही बुद्ध ने बताये हुये नियमो के बारे
पता करणा था | ज्ञान की प्राप्ती करणी थी | 
उसने पाच नदियो के प्रदेश पंजाब में सफर 
किया | और जगन्नाथ जाणे से पहले कुछ समय 
जैन लोगो के साथ बिताया |''

BBC ने इसपर '' जीजस वॉज या बुद्धिस्ट मॉंंक '' इस नाम कि डॉक्युमेंट्री बनायी है |

इसमे जाचकर्ताओ ने ये सिद्धांत रखा है कि, यीशु ख्रिस्त ने क्रुसीफिक्शन की सजा से खुद को छुडाने के बाद वे फिर भारत आये थे क्योंकी ये प्रदेश उन्हे अधिक प्रिय था | वे मौत से छुटकर अफगाणिस्तान में स्थित ज्यू लोगो से मिले | 

ये ज्यू लोग भी  ऐसे हि नेब्युकॅडनेझर इस ज्यू 
राजा के सजा से छुट अफगाणिस्तान में निकल 
आये थे |

इसके अलावा कश्मीर खोरे के स्थानीय लोग भी ऐसा बताते है कि, भारत लौट आये येशू ख्रिस्त ने उनका बचा जीवन कश्मीर खोरे में खुशी और शांती में व्यतीत किया |

उसके बाद के उम्र के ८० साल में उनकी मौत हुई | इस सिद्धांत को अगर सच मानते है तो जवानी कें सोलह  साल और बाद में क्रुसीफिक्शन के सजा से छुटने के बाद कि तकरीबन ४५ साल ऐसा ६० से ६५ साल का समय यीषु ख्रिस्त ने भारत में तिब्बत और आसपास के प्रदेश मे बिताया ऐसा कह सकते है | बहुतांश लोगो का ऐसा कहना है कि मृत्यू के पश्चात उनकी समाधी श्रीनगर के रोझाबाल मंदीर मी बनाई गयी | 





BBC ने इस मंदीर को जब भेट दी तब उन्हे ऐसा दिखा कि यह एक पारंपारिक देवस्थान है | यहा एक समाधी है | बहुतांश यहा के लोग ऐसा मानते है कि यही यीशु ख्रिस्त कि समाधी है | लेकीन ऑफिशीयली इस समाधी को याउझा असफ इस मुसलमान धर्मोपदेशक कि समाधी कहा जाता है | एक फोरेनर इन्सान ने इस संधी को तोड उसके अवशेष अपने साथ ले गया तब से ये समाधी पर्यटको के लिये बंद कि गयी है | 

यीशु ख्रिस्त भारत आये या नही ये एक विवादित मुद्दा है लेकीन बहुत से लोग अब इस बात को सच मानने लगे है |