कल्याण के सार्वजनिक सभा में बाबासाहब द्वारा सुनाया गया ये किस्सा जो सोचने को मजबूर कर देगा - HUMAN

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Friday, 30 November 2018

कल्याण के सार्वजनिक सभा में बाबासाहब द्वारा सुनाया गया ये किस्सा जो सोचने को मजबूर कर देगा


प्रसंग का विश्लेषण खुद बाबासाहाब की जुबानी 


सयाजीराव गायकवाड महाराज ने किसी विद्वान महार को बडोदा मे लाया है और जल्द हि वे उन्हे एक बडा पद बहाल करनेवाले  है इस प्रकार की खबर हवा की तरह पुरे बडोदा मे फैल गयी थी | इस परिस्थिती मे नकली नाम के सहारे डॉ.आंबेडकर किसी भी जगह ज्यादा दिन तक नही रह सकते थे | वे महार है ये बात एक दिन उस पारसी हॉटेल वाले को पता चली | वो अपने साथ लाठी वाले गुंडे लेकर डॉ. बाबासाहाब इनको मारणे के लिये उनकी तरफ लेकर गया |

*वो प्रसंग कैसा था वे डॉ. आंबेडकर खुद कल्याण के सार्वजनिक सभा मे बताते है -


'' मुझे बडोदा मे किसी हिंदू या मुसलमान के हॉटेल मे रहने को जगह नही मिली | तब मेरे पास कोई और विकल्प हि ना होणे के कारण मैने एक पारसी नाम धारण कर एक पारसी के धर्मशाला मे रहने का तय किया | उस समय इंग्लंड से आणे के कारण मेरा रंग भी काफी उजला था | धर्मशाला के चौकीदार ने मुझे दो रुपये रोज के हिसाब से धर्मशाला मे रहने के लिये कबूल किया | लेकीन मैने लिया हुआ पारसी का रूप ज्यादा दिन तक छुपा  नही रह सका | एक दिन १५ - २० पारसी हाथ मे लाठीया लेकर मेरे सामने आ खडे हुये |





उन्होने अत्यंत रागीट मुद्रा से मुझसे सवाल किया .." तुम कौन हो ?'' मैने कहा, ''मै हिंदू हु |" लेकीन मेरे जवाब से उनका बिलकुल भी समाधान ना हो सका | वो मारणे पर उतर आये | मैने उस वक्त अपना मनोबल संभाला, और उन्हे ८ घंटे की मुहलत मांगी | उनको मैने कहा ..'' आठ घंटे के अंदर मै ये जगह खाली कर देता हु |" उन्होने मुझे इतनी छुट दे दी | उसके बाद आठ घंटे रूम के लिये इधर उधर बहुत पुछताछ की लेकीन रहने के लिये जगह ना मिली | सभी जान पहचान के दोस्तो के पास गया लेकीन उन्होने भी कोई ना कोई बहाना बनाकर इन्कार किया | इस घटना से मै इतना बैचैन हुआ की अब आगे क्या करू यह समझ मे नही आ रहा था | अपना सर ले एक जगह बैठा और बहुत हि रोया |'




  यहा एक बात खास तौर पर समझ मे आती है ... वो ये की, मै हिंदू हु ये बताने पर भी, हिंदू .. पारशी और मुसलमान के साथ मिल जुलकर रहते है उन लोगो ने भी डॉ. आंबेडकर इनके साथ जो बदसलुखी की वो भूल नही सकते | पारसी तो हिंदू धर्म को मानते हि नही थे और मुसलमान भी जात - पात नही मानते थे उन्होने भी अपने धार्मिक निती का पालन नही किया |

   बाबासाहाब जी का बस इतना हि अपराध था की उनको 'अछूत ' समज मे आणे के कारण भी उन्होने अपनी पहचान  हिंदू बतायी |

 सबसे दुख और आश्चर्य की बात यह है की खुद सयाजीराव गायकवाड महाराज ने भी इस सारी घटना पर चुप्पी साधी | उनकी जगह छत्रपती शाहू महाराज होते तो इन हिंदू हॉटेल वालो का और पारसी धर्मशाला वालो का अच्छेसे बंदोबस्त किया रहता उन्होने , और बाबासाहाब को रहने के लिये जगह उपलब्ध कराके देते इसमे कोई शक नही | लेकीन सयाजीराव गायकवाड महाराज दान मे बडे दिलवाले होकर भी मन से हिंदू हि थे... इस बात से यह स्पष्ट होता है | उन्होने अगर मन मे ठाण लिया होता तो बाबासाहाब पर ऐसी बुरी नौबत हि ना आयी होती | 
 इस प्रसंग के बाद बाबासाहाब मुंबई वापस लौट गये |