जाणिये क्या हुआ था जब राजपुरोहित ने स्नानपर्व के प्रसंग पर वेदमंत्र के उच्चारण से इन्कार किया - HUMAN

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Thursday, 15 November 2018

जाणिये क्या हुआ था जब राजपुरोहित ने स्नानपर्व के प्रसंग पर वेदमंत्र के उच्चारण से इन्कार किया

शाहू महाराज ,



ब्राम्हण संस्कृती के अमानवीय कृत्य 


  भारत मे प्राचीन काल से दो भिन्न और परस्पर विरोधी विचारप्रवाह प्रचलित है | इन दोनो विचारधारा को संस्कृती नाम से संबोधित करणे की प्रथा है | एक है ब्राम्हण संस्कृती और दुसरी है श्रमण अर्थात संत संस्कृती | इस ब्राम्हण संस्कृतीने जिस विकृती से महाराष्ट्र के पेशवाई के काल मे जिस तरह अछुतो की दुर्दशा की उसका सजीव चित्रण बाबासाहाब जी ने अपने '' एनिहीलेशन आॅफ कास्ट '' अर्थात ''जातीभेद का समुल उच्चाटन '' इस अपने ऐतिहासिक और क्रांतीगर्भ किताब मे किया हुआ है | इस संदर्भ मे उनका कहना है - '' पेशवाई के कालकीर्द मे गर कोई सवर्ण  रास्ते से गुजर रहा हो तो उस रास्ते से अछुतो को गुजरने की सख्त पाबंदी थी | अछुतो की परछाई से वो सवर्ण बट ना जाये यही एक पसंदीदा कारण होता | अछुतो को अपने गले मे काला धागा बांधना पडता वो अछूत होणे की निशाणी होती | पेशवावो की राजधानी पुना मे अछुतो को कमर मे झाडु बांधकर हि वे घर से निकले ऐसी उनपर सख्त पाबंदी थी | क्योंकी रास्ते से चलते वक्त पैर के निशाण का साफ होणा , उनके पैर के निशाण पर किसी सवर्ण के पैर पडे तो वो अछुता हो जाता ऐसा ना हो इसके लिये कमर मे झाडु होता निशाण की सफाई के लिये | गले मे मटका होता क्योंकी रास्ते पर थुकने की उन्हे सख्त मनाई थी| थुकना  हो तो गले के मटके मे ही उनको थूकणा पडता | ''

  इस ब्राम्हण संस्कृती का कहर इतना था की खुद लोकमान्य तिलक को भी एक ख्रिश्चन के हाथो की चाय पिणे पर सनातनी सवर्णो के सामने  प्रायश्चित लेना पडा था |

साहू महाराज, शाहू महाराज, डॉ.आंबेडकर


छत्रपती शाहूजी महाराज  

बाबासाहाब ने जातीव्यवस्था का जो गहन अध्ययन किया था और उन्हे जो भयंकर कडवे अनुभव जातीव्यवस्था से आये थे उस कारण वे ब्राम्हण संस्कृती के कट्टर विरोधक बन चुके थे | १८९४ को छत्रपती शाहू महाराज को कोल्हापूर संस्थान के राजा के तौर पर अंग्रेजो की तरफ से नियुक्त किया गया | उनके मन पर ज्योतिबा फुले के कार्य का काफी प्रभाव था| obc समाज के उत्थान हेतू उन्होने बहुत से कार्य किये थे उस वक्त | इस कारण वे ब्राम्हण समाज के दुश्मन बने थे | उन्होने शाहूजी महाराज को अपमानित करणे के लिये भी कोई कसर बाकी नही छोडी | राजपुरोहित ने स्नानपर्व के प्रसंग पर वेदमंत्र के उच्चारण से इन्कार किया | महाराज ने उससे पूछा - ''आप मन्त्रो का उच्चारण क्यो नही कर रहे है ?'' उसपर  भटजी बोहार बोला,''आप शुद्र हो आपको वेद मंत्र सुनने का अधिकार नही|'' उस वक्त के कोल्हापूर के शंकराचार्य ने उस भट पुरोहित का समर्थन किया था | शाहूजी महाराज मराठा थे | उस भट के और शंकराचार्य के इस वर्तन से वे बिलकुल भी विचलित ना हुये | उन्होने शंकराचार्य को उसके  पद से पदच्युत किया | उनके इस कार्य से उस वक्त पुरे महाराष्ट्र मे वैचारिक उथल पुथल मची थी | जिन ब्राम्हनोने महाराज की कठोर शब्द मे निंदा की थी उसमे सबसे उपर थे, ब्राम्हणपंडित केसरी के संपादक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ! लोकमान्य तिलक राजकारण मे जितने प्रगत थे उतणे हि वे समाज सुधारण के कार्य मे पीछे थे |

कोल्हापूर के शाहू महाराज ने अपने संस्थान मे सामाजिक सुधारणा और छुआ छुत निर्मुलन का कार्य बडे हि बेधडक शुरू रखा था | सन १९१९ मे महाराज शाहूजी और डॉ. आंबेडकर की मुलाकात हुई | १९२० को महाराज की मदद से बाबासाहाब ने  'मूकनायक' नाम का पाक्षिक शुरू किया | लोकमान्य तिलक समाज सुधारना और छुत अछूत दूर करणे के इतने घोर विरोधक थे की उन्होने ' मूकनायक ' इस पाक्षिक की जाहिरात प्रसारण से साफ इन्कार कर दिया था | इस पाक्षिक के प्रारंभी अग्रलेख बाबासाहाब जी ने खुद हि लिखे है | 

१९२० को डॉ. आंबेडकर इनकी अध्यक्ष्यता मे अछूत वर्ग की एक परिषद आयोजित की गयी थी | उस परिषद मे छत्रपती शाहू महाराज बडे हि आत्मविश्वास और गौरव भरे शब्द से बोले ... उन्होने कहा -
 '' डॉ. आंबेडकर के रूप मे हमे आज एक सच्चा कैवारी ( उद्धारकर्ता)  मिला है | अपने जीवनसे जखडी हुई छुआ छुत  की जंजिरे वह तोड देंगे और इस सामाजिक गुलामी से वही हमे मुक्त करेंगे इसपर मेरा अटल यकीन है | मेरा मन मुझे इस बात की गवाही दे रहा है, की आनेवाले  वक्त मे भारत की सर्वोच्च श्रेणी के नेताओ मे डॉ. आंबेडकर की गौरवसे गणना की जायेगी |''



 सामने शाहूजी महाराज की दिव्य वाणी सत्य साबित हुई इतिहास इस बात का साक्षी है |