नही तो धिक्कार है इस शिक्षा पर : ऐसा अपने इस भाषण में बाबासाहाब ने क्यो कहा? - HUMAN

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Friday, 9 November 2018

नही तो धिक्कार है इस शिक्षा पर : ऐसा अपने इस भाषण में बाबासाहाब ने क्यो कहा?

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युवा कैसे होने चाहिए


डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने मनमाड यहा युवा ओ को किया हुआ मार्गदर्शनपर भाषण

कठीण परिश्रम 


बाबासाहब अपने भाषण में कहते हैं,"इन्सान के जीवन का खाना, पीना और जीना बस इतना ही लक्ष नही होना चाहिए। खाना-पिना जीने के लिए होना चाहिए और जिंदगी सन्माननीय होने के लिए समाजसेवा में तत्पर उसने  होना चाहिए। नही तो खाने लाले और धरती को बोझ ऐसा जिना जिया क्या और मरणा क्या कोई मतलब नही। युवाओ ने एक बात ध्यान में रखनी चाहिए, किसी भी अच्छी चीज को हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। कार्य आत्मोन्नती का हो या राष्ट्रोन्नति का उसके लिए  कोशिश करते रहना चाहिए। इंसान ने उस कार्य में खुद को झोंक देना चाहिए। मैंने बहुत से नए पीढ़ी के युवा को देखा हैं, जो ज्यादा समय तक एक जगह नही बैठ सकते, उन्हें थोड़ी थोड़ी देर बाद स्मोकिंग करना उनकी जरूरत होती हैं, चाय पिणी पड़ती हैं | उसके सिवा वे काम हि नही कर सकते। ये ठीक नही । 24 घंटे में से 20 घन्टे सलग टेबल पर बैठके काम करते आना चाहिए। मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में यहा और विदेश में भी 20 घन्टे एक जगह बैठ कर काम किया हैं।

महत्वकांक्षा 


 जिस किसी को भी अपनी बुद्धि का प्रभाव बढ़ाना है उसने श्रम करना चाहिए। मनुष्य संकट में या गरीबी में फसा हो तो वो निराश हो जाता है। हमे यश नही मिलेगा ये भावना उनके मन में निर्माण हो जाती हैं। अगर इस भावना ने इंसान को घिरा तो वो अपने जीवन में निरर्थक साबित होगा। प्रत्येक युवा ने उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिये। जिस दिन उसने उम्मीद छोड़ी उस दिन वो इस दुनिया में जी रहा है या मर गया एक ही समान हैं। हर एक युवा में महत्वकांक्षा का होणा जरुरी है। महत्वकांक्षा के अलावा इंसान प्रयत्न, भागदौड़ कर ही नही सकता अपने जीवन में। इसलिये अछूत युवा में महत्वकांक्षा का बीज प्रथमतः गहराई तक होना चाहिए।



शिक्षा 


आज शिक्षा के दरवाजे हमारे लिए खुले  हैं। आज शिक्षा की जो सुविधाएं मौजूद हैं वो हमारे वक्त नही थी। हमे उस वक्त किसी कि भी मदद नही थी। मैं जब विश्वविद्यालय में था,.. उस वक्त मै, मेरे पिताजी 8 बाय 8 के लंबाई और चौड़ाई वाले खोली में रहके कॉलेज का अध्ययन करना पड़ता था। आज की स्थिति बदल चुकी है। हम में से हर एक ने सुविद्य होना चाहिए ऐसी मेरी बहुत ही चाह हैं। क्योंकि शिक्षा ये तलवार हैं। शिक्षा शस्त्र हैं। अगर  एखाद इंसान यह तलवार लेके आया तो आप सभी घबरा जाओगे। लेकिन विद्या का शस्त्र हमेशा इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर होता है। शस्त्र से अबला का संरक्षण इंसान कर सकता है।

शील और सौजन्य 


अच्छे इंसान के हाथ में शस्त्र उत्तम, लेकिन बुरे इंसान के हाथ में अच्छे नही। शिक्षा लिए हुए इंसान के अंदर अगर शील और सौजन्य नही होगा तो वो हिंस्र पशु से भी अधिक क्रूर और भयावह होगा। हिन दिन गरीब जनता शिक्षित नही । उनके अज्ञान का फायदा शिक्षित, सेठजी, भटजी,वकील सभी लोग उठाते हैं। इस तरह सिर्फ गरीब लोगो को छलने के लिए ही शिक्षा का उपयोग हो रहा होगा तो धिक्कार है इस शिक्षा का। अपने शिक्षा का उपयोग अपने कमजोर, गरीब लोगो के उद्धार के लिए न करके अगर शिक्षा लेकर अपनी नोकरी भली, अपने बीवी-बच्चे भले,.. इस भावना से आज के शिक्षित युवा अगर पेश आ रहे हैं तो उनका समाज के लिए क्या उपयोग? युवाओ ने अपनी जिम्मेदारी जानकर कार्य करने लग जाना चाहिए। जनता के अंदर जो घबराहट दिखती है उंसके लिए युवा ही जिम्मेदार हैं। उसे सिर्फ युवा ही बदल सकते हैं। उसके लिए पहले तैयार रहना चाहिए। मैं गांधी जी जैसा महात्मा नही। मेरे पीछे आप लोगो के अभेद्य एकता का कवच हैं। उससे ही मुझे मजबूती आई है। इसीलिए आप आपस में मत लड़ो। मान सम्मान के लिए स्पर्धा कर आपस में बैर उत्पन्न ना करो। लेकिन दुनिया में फोकट में खानेवाले को मान सम्मान नही मिलता ये भी याद रखना।