जब मराठा लोगो को ब्राम्हनो ने मंदिर में प्रवेश करणे से रोका था : जाणिये इसपर बाबासाहाब कि प्रतिक्रिया - HUMAN

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Friday, 23 November 2018

जब मराठा लोगो को ब्राम्हनो ने मंदिर में प्रवेश करणे से रोका था : जाणिये इसपर बाबासाहाब कि प्रतिक्रिया


*मराठा समाज के लोगो को भी सवर्णों ने मंदिर में प्रवेश करने से रोका था क्योंकि मराठा भी शुद्र ही हैं...


16 सितंबर 1920 को पंढरपुर में स्थित पांडुरंग के मंदिर में 96 कुलि(शाहनु कुले )  मराठा ज्ञाती भाइयो ने प्रवेश किया था । शूद्रों ने भगवान को अपवित्र किया कहकर मंदिर के पुरोहित द्वारा  मंदिर की खिड़कियां, दरवाजे बंद कर दिये गये और उन 96 कुलि मराठा ज्ञाती बांधवो को इतनी बुरी तरीके से पीटा की उसमे से 3 लोग बेहोश हुए थे।

इस बात का पता  जब बाबासाहब को चला था  तब वे विदेश में पढ़ाई कर रहे थे। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर इस बात से अत्यंत विचलित हुए। "मैं विदेश में हु, मेरे बंधुओ पर हो रहे जुल्म पर मैं कुछ नही कर सकता।"  कुछ समय तक सोचने के बाद डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने सीधा एक खत "मुकनायक" के संपादक को लिखा ।(मुकनायक ये अख़बार भारत के तमाम शोषित पीड़ित शुद्र,अतिशूद्र समाज के लोगो की पीड़ा सामने लाने के लिए 31 जनवरी 1920 को डॉ. बाबासाहब द्वारा शुरू किया हुआ अख़बार) इस खत में वे लिखते हैं...





16 सितंबर 1920 को पंढरपुर के मंदिर में मेरे सात 96 कुलि मराठा ज्ञाती बंधुओ पर जो अत्याचार हुआ वो एक भी ब्राम्हण वार्ताहार ने अपने अख़बार में नही छापना जरुरी नही समझा। आप इस अमानवीय अत्याचार की खबर मुकनायक के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित करो और मेरे मराठा ज्ञाती बंधुओ को न्याय दिला दो।"

ये खत जब मूकनायक के संपादक को मिला तब २३ अक्तूबर १९२० को वे इस बात को "मूकनायक'' के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित करते है और इस खबर से मराठी प्रांत सहित पुरे देश में वैदिक व्यवस्था संकल्पित हिंदू धर्म के जातीय मानसिकता के खिलाफ गुस्से कि लहर फैलती है |

(संदर्भ - इतिहासातील निवडक गांधीगिरी - पृष्ठ १३, १४, लेखक प्रा.सुरेश माने... हिंदी अनुवाद )





आज से ९७ साल पहले भी मराठा समाज के लोगो बंधू कहकर संबोधित करनेवाले , विदेश में रहते हुये भी अपने देश के लोगो के लिये इतनी चिंता और आत्मीयता, जात- पात, लिंग, वंश, कुल इसके उपर उठ कर समस्त शोषितो को बुद्ध धम्म की मानवतावादी राह समस्त शोषित, वंचित, पिडीत लोगो को दिखाने के लिये अपने संपूर्ण जीवन का हर पल जिसने खर्चा किया वो महामानव आज भी इस देश वैदिक, सनातन संस्कृती निर्मित स्वयंसंकल्पित जातीय अहंकार मन में लिये जी रहे बहुसंख्य समाज को समझ में ना आणे कि वजह से आज भी खोले  बाई जैसी जातीय मानसिकता समाज में जहर फैलाने का काम करती है | यह  दुखद है | 

पंढरपूर के पांडुरंग के मंदिर में घटीत इस जातीय अत्याचार को आज ९७ साल होणे को आये है | कुछ नही तो कम से कम इस दिन से तो जाती का झुटा नकाब उतारकर इंसान के भीतर बसे असल मनुष्य  को पहचान मानवीय मुल्यो को न्याय मिले और ' बोधिसत्व डॉ. बाबासाहब आंबेडकर' इनके  मानवी मूल्य आत्मसात करणे हेतू कटिबद्ध होंगे यही अपेक्षा....|