धम्मदीक्षा समारंभ १४ अक्तूबर १९५६ नागपूर : आधी रात को कहा से आयी थी बुद्ध मूर्ती? जाणिये - HUMAN

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Saturday, 3 November 2018

धम्मदीक्षा समारंभ १४ अक्तूबर १९५६ नागपूर : आधी रात को कहा से आयी थी बुद्ध मूर्ती? जाणिये

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धम्मदीक्षा समारंभ में आधी रात को कहा से आयी थी बुद्ध मूर्ती


अपने लाखो अनुयायीयो के साथ बाबासाहब ने 14 अक्टूबर1956 को दीक्षा ली। इस दीक्षांत समारोह में अनेक हाथ मेहनत कर रहे थे। बाबासाहब ने आधी रात को ही दीक्षा समारंभ में बुद्धमूर्ती लाने को कहने पर कार्यकर्ताओ पर कैसे कठिनाई की घड़ी आयी उस बारे में कुछ...

१४ अक्टूबर 1956 को  बाबासाहब अपने 5 लाख अनुयायीयो के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा लेने वाले थे। 11 तारीख को ही बाबासाहब माईसाहेब के साथ नागपुर आये।बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह की  तैयारी की सभी जिम्मेदारी बौद्ध जनसभा के नागपुर शाखा की तरफ थी। वामन राव गोडबोले ये इस सभा के प्रमुख थे। नागपुर आते ही बाबासाहब ने इस समारोह की तयारी के संदर्भ में सभाए ली। श्याम होटल के रुम नंबर 116 से हर छोटी छोटी बातों पर उनकी बारीकी से नजर थी।

जब मूर्ती कि व्यवस्था नही कि गयी थी....


धम्म दीक्षा समारोह की पूर्वसंध्या को भिक्षु ओ ने परित्राण पाठ को शुरवात की। होटल के रूम से बाबासाहब खिड़की से बाहर देख रहे थे। हजारो लोगो के समूह,छोटे,बडे , बच्चे दीक्षाभूमी पर आ रहे थे | पास ही रुके हुए वामनराव गोडबोले को बाबासाहब ने कहा ,"बौद्ध धर्म के इतिहास में पहली बार लाखो लोग धम्म में प्रवेश ले रहे  है। कल समारोह के मुख्य मंच पर तथागत गौतम बुद्ध की बड़ी मूर्ति रखिये। समारोह के लिए लायी गयी मूर्ति कहा है?"

अभी रात हुयी थी। अब बुद्ध मूर्ति कहा से लाये, ऐसी समस्या गोडबोले के सामने खड़ी हुई। क्योंकि मूर्ति किसी भी प्रकार की व्यवस्था उन्होंने नही की थी। उन्होंने बाबासाहब को वैसा बताया।

"लेकिन तथागत की मूर्ति के बिना कैसे होगा? "बाबासाहब ने गोडबोले से कहा। मुझे ये पहले पता होता तो मैंने मेरे दिल्ली के घर से निकलते वक्त वहा से मूर्ति लायी होती। लेकिन अब रात हुयी हैं।दुकान भी बंद हुए होगे और मुझे नहीं लगता कि नागपुर में बुद्ध की मूर्ति मिलेगी।"

लाखो लोग दिक्षाभूमि पर इकठ्ठा हुए थे। कल सुबह ऐतिहासिक समारोह को शुरवात होनेवाली थीं। पुरे विश्व को अहिंसा, प्रेम और करुणा का संदेश देनेवाले तथागत भगवान गोतम बुद्ध की मूर्ति अभी तक मंच पर नही थी।


समस्या का हल ऐसे निकला 


घड़ी की सुई मध्य रात्री की तरफ बढ़ रही थी और इधर बाबासाहब के मन में भी चिंता बढ़ती रात के साथ और घनी होती जा रही थी।

लेकिन हार मान के बैठे वो बाबासाहब ही क्या? नागपुर में उस उपलब्ध सुरेख विशाल मूर्ती मध्य रात्रि के बाद समारोह के मुख्य मंच पर विराजमान हुयी।

बाबासाहब ने किये फोन,और उनके दिए हुए खत के द्वारा यह संभव हुआ।
 धम्म दीक्षा समारोह में बुद्ध मूर्ती चाहिए ही थीं।लेकिन अब इतनी रात गये बुद्ध मूर्ती कहा से लाये ये सवाल सामने था। इतने में गोडबोले इनको एक उपाय सुझा। नागपुर में सहकारी मध्यवर्ती संग्रहालय हैं। ये संग्रहालय अजब बंगला के रूप में आज भी पहचाना जाता है। वहां भगवान बुद्ध की एक धातु की मूर्ती होने का स्मरण गोडबोले को हुआ। लेकिन इतनी रात गये ये संग्रहालय खोलेगा कौन और कैसे? क्योंकि संग्रहालय कि सुरक्षितता के नजर से ये मुश्किल ही था।



बाबासाहब ने कहा "चिंता खत्म हुई, वो मूर्ति हमे मिलेगी।"
गोडबोले ने कहा,' लेकिन इतनी रात गये ये संभव कैसे होगा?'
बाबासाहब ने गोडबोले जी को बताया, की ''धम्म दीक्षा समारोह के लिए जब मैं नागपुर आ रहा था. तब हवाई जहाज  सफर में मुख्यमंत्री रवी शंकर शुक्ला मेरे साथ थे। इस समारोह के लिए मुमकिन सभी सहायता करने का आश्वासन उन्होंने मुझे दिया। मैं अभी मुख्यमंत्री को फोन करता हूँ।'

महाराष्ट्र राज्य की निर्मिति होने से पहले सीपी अँड बेरार राज्य की राजधानी नागपुर थीं।'सेंट्रल प्रोव्हिंस अँड बेरार ' याने मध्य प्रांत और वराड ऐसा वो राज्य था। शुक्ला ये तत्कालीन मुख्यमंत्री थे। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जी ने तुरंत मुख्यमंत्री को फोन किया। उन्हें सब हकीकत बतायी। मुख्यमंत्री शुक्ला ने बाबासाहब को आश्वस्त किया और कहा आप अपना लिखा हुआ खत किसी को लेकर भेजिए और चाहिए वो मुर्ती लेकर जाइये। मैं व्यवस्था करता हु।'' ऐसा बताया।

बाबासाहब का  लिखा हुआ खत लेकर कार्यकर्ता रात को ही अजब बंगला गये, उसके पहले ही मुख्यमंत्री शुक्ला ने फ़ोन करके संग्रहालय का दरवाजा संग्रहालय के क्यूरेटर एस. एस. पटवर्धन इनको खोल कर बुद्ध मूर्ती देने का आदेश दिया।

ब्रासो कहा से लाये थे ?

लेकिन अभी काम पूरा नही हुआ था। क्योंकि बहुत साल से वो मूर्ती संग्रहालय में होने के कारण उसपर जरा भी चमक नही थीं। अब इतनी रात गये पोलिश के लिए ब्रासो कहा से लाये ये समस्या खड़ी हुई। लेकिन उसपर भी उपाय निकला । पास ही सीताबर्डी पोलिस स्टेशन था। वहा के सिपाही अपने बिल्ले चमकाने के लिए ब्रासो का इस्तेमाल करते।वहा से हम वो लेके आएगे ऐसी आयडिया किसी को तो भी सूझी। फिर क्या पोलिस स्टेशन गये। लेकिन इतने रात गये सिर्फ एक बार मांगने पर  ब्रासो मील जायेगा ये भी इतना आसान नही था।लेकिन डॉ. बाबासाहब अंबेडकर और मुख्यमंत्री शुक्ला इनका संदर्भ देते ही ब्रासो मील गया। और अंत में तथागत के मूर्ति पर सोनेरी चमक आयी। सुबह होने से पहले ही वो मूर्ती धम्म दीक्षा समारोह के मुख्य मेज पर विराजमान हुयी।