डॉ.अम्बेडकर संविधान के शिल्पकार नही हैं ऐसी बेतुकी बात कहने वाले जाणिये सच्चाई क्या है - HUMAN

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Monday, 26 November 2018

डॉ.अम्बेडकर संविधान के शिल्पकार नही हैं ऐसी बेतुकी बात कहने वाले जाणिये सच्चाई क्या है




 डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर संविधान के शिल्पकार नही हैं ऐसी बेतुकी बात कहने वाले मुर्ख लोगो  को ये बात समझ में नही आती की, संविधान निर्मिति के लिए २२ समितीया गठीत की गयी थी। हर समिति को कामो का बटवारा करके दिया गया था। जैसे की हिंदी भाषांतर समिति, उर्दू भाषांतर समिति, अख़बार प्रेक्षागृह समिति इत्यादि जैसे समितियों का सीधा संबंध संविधान निर्माण कार्य से उतना संबध नही था।"मसूदा समिती" इस समिति को ही घटना का मसूदा निर्माण करने का काम सौंपा गया था। मसूदा समिति के अध्यक्षीय स्थान पर बाबासाहब आंबेडकर विराजमान थे। मसूदा समिति में केवल 7 लोग सदस्य थे। उन सदस्यों ने अलग अलग कारणों से घटना का प्रारूप या मसूदा निर्माण करने का काम बिच में छोड़ दिया उस वजह से मसूदा निर्माण करने पूरी जिम्मेदारी अध्यक्ष इस नाते डॉ. आंबेडकर पर आण पड़ी। ऐसी सरकारी दस्ताऐवजो में नमूद होते हुए भी अकेले बाबासाहब ने घटना नही लिखी ऐसा बोल  कुछ महाभाग खुद के अल्पज्ञान का परिचय देते हैं |
इस संदर्भ में महाराष्ट्र शासन द्वारा  प्रकाशित "डॉ. आम्बेडकर गौरव ग्रंथ" का संदर्भ दे रहे हैं। वो सिर्फ तटस्थ मानसिकता वाले ही पढ़े। क्योंकि बाबासाहब के बारे में मन में द्वेषभाव रखे हुए लोगो को समझाना उतना सरल कार्य नही हैं।

सबूत क्रमांक 1

मसूदा समिति के सभासद टी. टी. कृष्णमचारी अपने ५ नवम्बर 1948 के भाषण में कहते हैं,"इस संसद में मौजूद सभी सांसदों को पता होगा की, मसूदा समिति पर हमने जिन 7 सदस्यों को चुना था, उनमे से एक ने राजीनामा दिया। उसकी जगह किसी और को नियुक्त नही किया गया। एक सभासद की मृत्यु हुई। उसकी भी कमी पूरी नही की गयी। एक अमरीका गया। उसकी भी जगह खाली ही रही। चौथा सभासद संस्थानो से संबधित कामकाजों में व्यस्त रहा। इस वजह उस सभासद का भी होना ना होना एक जैसा ही था। एक दो सभासद दिल्ली से दूर थे । खराब स्वास्थ्य के कारण वह भी उपस्थित नही रहे । अंत में ऐसा हुआ की घटना निर्मिति के  पुरे कामकाज की जिम्मेदारी आण पड़ी डॉ. अंबेडकर पर। ऐसे परिस्थिति में जिस तरीके से ये कार्य पूर्ण हुआ उसके लिए निसंदेह वे सम्मान के हकदार हैं।''

सबूत क्रमांक 2

घटना समिति के एक सदस्य श्यामनंदन सहाय अपने भाषण में कहते हैं,"इस सभागृह ने ही नही तो पूरे देश डॉ. अंबेडकर के इस कार्य की सराहना करनी चाहिए। जिस कौशल्य और प्रभुत्व से डॉ. अंबेडकर ने घटना विधेयक सभागृह में संचालित किया, इसके लिए सिर्फ हम लोगो ने ही नही तो भविष्यकाल ने भी उनसे कृतज्ञ होना चाहिए।"

सबूत क्रमांक 3

घटना  समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा,"इस कुर्सी पर बैठ प्रतिदिन मैं घटना समिति के कार्य का अवलोकन कर रहा था। विशेषतः मसूदा समिति के सदस्य डॉ. अंबेडकर इन्होंने अपने स्वास्थ्य की परवाह किये बगैर इस काम को पूरा किया।"
डॉ.अम्बेडकर के अकेले घटना निर्मिति के कार्य पर सवाल उठाने वालों के लिये  मुझे लगता है ये सबूत काफी हैं।(संदर्भ: डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर गौरव ग्रंथ,पृष्ठ क्र.10,प्रकाशक :महाराष्ट्र राज्य साहित्य आणि संस्कृती मंडल, महाराष्ट्र शासन,; हिंदी अनुवाद)

साथ ही बाबासाहब पर मसूदा समिती के अध्यक्ष के तौर पर जो मुलभुत जिम्मेदारी थी इसके अलावा उन्हें घटना समिती के भी 9 समितीयो पर सभासद के तौर पर नियुक्त किया गया था...
वह समितीया थीं-
1)संविधान निर्माण समिती
2)ध्वज समिती
3)मुलभुत अधिकार समिती
4)मताधिकार समिती
5)संविधान समिती
6)अल्पसंख्यक समिती
7)सल्लागार समिती
8)नागरिकत्व विशेषाधिकार समिती
9)सर्वोच्च न्यायालय विशेषाधिकार समिती मसूदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बाबासाहब अंबेडकर
सदस्य;
1)अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
२)के. एम.मुंशी
३)गोपाल अय्यंगार
४)एन. माधवराम
५)मोहम्मद सादुल्ला
६)डी. सी. खेतान
🙏🏻🙏🏻🙏🏻




भारतीय राज्यघटना मतलब -डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के vision का दिमाखदार product.

२६जनवरी1950 से राज्यघटना लागू की गयी। तब से लेके आजतक इस घटना के मार्गदर्शन से ही देश का कामकाज  चल रहा है। इतने सारे जाती-धर्म से युक्त दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही, प्रगती कर रही हैं तो सिर्फ राज्यघटना के कारण ही। लेकिन इस राज्यघटना पर जो सवाल उठते हैं उसी में से एक यह की - भारतीय राज्यघटना origanal नही ,तो दूसरे देशो के संविधान की कॉपी है।

ऐसे सवाल अपमाना स्पद है आपको क्या लगता है, संविधान लिखने वाले जो देश के बुद्धिमान लोग थे,क्या इतने बेवकूफ होंगे की दूसरे देश के संविधान की कॉपी जैसे की वैसी करेंगे?

अपना देश बिते 67 सालो में इतना कुछ सह गया (including आणीबाणी), तरक्की कर रहा हैं क्या वो एक "कॉपी"किये गए संविधान  के भरोसे?

क्या आपको सच में ऐसा लगता हैं? कि दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही जो पूरे विश्व में मिसाल है , वो बाकी दूसरे देश के संविधान के भरोसे, तुक्को के वजह से कार्यान्वित होगी?

ध्यान दीजिए- 3 साल संविधान पर चर्चा हुई। राज्यघटना के हर शब्द पर चर्चा हुई। दूसरे देश के राज्यघटना का अध्ययन किया गया। उन देशों की समस्याएं,परिस्थिति और अपना देश, समाज यहा की भौगोलीक सामाजिक,राजकीय, आर्थिक इन सभी पहलुओं का अध्ययन किया गया। इन सबसे सकारात्मक और भारत के लिए लाभदायक उन सभी बातों को संविधान में समाविष्ट किया गया।

हर बात को भारत के लिए modify किया गया और उसी के अनुरूप स्वीकार किया गया। किसी भी अध्ययन के अलावा ऐसे इल्जाम करना अज्ञानता की निशानी है। अपनी राज्यघटना 66 साल से भी अधिक समय से देश को दिशा देने का काम कर रही है। भारतीय राज्यघटना govt. of india Act, 1935 और बाकि देशों के राज्यघटना के आधार पर ही बनायीं गयी है। लेकिन इसका मतलब आप ये निकाल रहे हैं कि ,"भारत का संविधान कॉपी पेस्ट हैं" तो ये सिर्फ पागलपन ही होगा। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने इस आरोप का awsome जवाब दिया हैं......


“It is said that there is nothing new in the Draft Constitution, that about half of it has been copied from the Govt. of India Act of 1935 and that the rest of it has been borrowed from the Constitutions of other countries. Very little of it can claim originality.
One likes to ask whether there can be anything new in a Constitution framed at this hour in the history of the world. More than hundred years have rolled over when the first written Constitution was drafted. It has been followed by many countries reducing their Constitutions to writing. What the scope of a Constitution should be has long been settled. Similarly what are the fundamentals of a Constitution are recognized all over the world. Given these facts, all Constitutions in their main provisions must look similar. The only new things, if there can be any, in a Constitution framed so late in the day are the variations made to remove the faults and to accommodate it to the needs of the country. The charge of producing a blind copy of the Constitutions of other countries is based, I am sure, on an inadequate study of the Constitution…
As to the accusation that the Draft Constitution has produced a good part of the provisions of the Govt. of India Act, 1935, I make no apologies. There is nothing to be ashamed of in borrowing. It involves no plagiarism. Nobody holds any patent rights in the fundamental ideas of a Constitution…provisions taken from the Government of India Act, 1935, relate mostly to the details of administration. 4th Nov 1948, Constituent Assembly

घटनाकार आंबेडकर यही नही रुके ! वो आगे कहते है “एक पुर्णरूप से  नयी तरीके से लिखी गयी राज्यघटना देश के लिये सही रहती क्या ?” इस सवाल का भी उन्होने  दमदार जवाब दिया  : “I feel, however good a Constitution may be, it is sure to turn out bad because those who are called to work it happen to be a bad lot. However bad a Constitution may be, it may turn out to be good if those who are called to work it, happen to be a good lot. The working of a Constitution does not depend wholly upon the nature of the Constitution.”

किसी भी देश को खुद कि, राज्यघटना implement करणे का मौका कम हि मिलता है | अगर इस मौके का लाभ नही उठाया गया तोआगे चल कर देश में द्न्गो का माहौल बन जाता है | अपने देश में राज्यघटना अहिंसक तरीके से स्वीकृत और लागू भी कि गयी  और सभी को किसी खून खराबे के बिना समानता कि शाश्वती  मिली |