डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर इस विद्यार्थी ने युवा अवस्था में जो प्रबंध लिखा : जाणिये उसके बारे में - HUMAN

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Friday, 9 November 2018

डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर इस विद्यार्थी ने युवा अवस्था में जो प्रबंध लिखा : जाणिये उसके बारे में

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विश्वभूषण डॉ. बाबासाहाब आंबेडकर 


बाबासाहाब कि  तारुन्यावस्था अत्यंत संघर्षमय गुजरी | शिक्षा लेते वक्त ही उन्हे बहुत ज्यादा मानहानी सहनी पडी | लेकीन वे विचलित नही हुये | परिस्थिती से लडना कैसे है इस बात में वे समर्थ थे | बचपन में नाई ने उनके बाल काटने से इन्कार किया, पिता से मिलने के लिये बैलगाडी से आते वक्त आया हुआ स्वअनुभव, शिक्षा लेते वक्त क्लास के बाहर बैठ्ने की परिस्थिती, उच्च शिक्षा लेकर भारत आणे के बाद एलफिस्टन कॉलेज यहा कि बडोदा के सयाजीराव गायकवाड इनके संस्थान में आया हुआ अनुभव ऐसे एक नही कई स्वअनुभव उन्होने आत्मसात किये | लेकीन मन में वो दुख उन्होने नही रखा इसका बात का पता भारतीय संविधान से चलता है |

*संप्रदाय को अधिक महत्व या देश को ?


   " भारतीय राज्यघटना का भवितव्य''  इस विषय पर 26  नवम्बर 1949 को किये हुए भाषण में वे स्पष्ट इस बात का उल्लेख करते हैं, "अपने देश में जातीय व्यवस्था और साम्प्रदायिक रचनाओ ने नफरत बोई हैं।उसमें अब विभिन्न विचारो के अनेक राजकीय पक्षो की और परस्पर विरोधी राजकीय गट इनकी वृद्धि होगी। भारतीय नागरिक अपने संप्रदाय से अधिक देश को महत्व देंगे या देश से अधिक संप्रदाय को महत्व देंगे? मैं नही बता सकता।लेकिन एक बात पक्की बता सकता हूँ राजकीय पक्षो ने देश से अधिक संप्रदाय को महत्व दिया तो हम दूसरी बार अपनी स्वतंत्रता धोके में डालेंगे और सब कुछ गवा देंगे। इस आपदा से हमने अपने देश कि दृढ़ता से निश्चय पूर्वक रक्षा करनी चाहिए। अपने खून के आखरी छीटे तक हम अपने स्वतंत्रता का रक्षण करेंगे।"


*एक राष्ट्रीयता की भावना 


मानसिक दृष्टि से देखे तो हममे एक राष्ट्रीयता की भावना नही है। जाती सामाजिक जीवन में फूट डालती है। जाती राष्ट्रविरोधी हैं। क्योंकि जाती आपस में द्वेष भावना निर्माण करती है। हमे एक राष्ट्रीयता पूर्ति की चाह होगी तो इन विपदाओं पर हमने मात करनी ही होगी। भाईचारा, समता और स्वतंत्रता के अलावा राष्ट्रीयता का  मतलब सिर्फ ऊपरी गुलामी ही होगी।" "किसी भी बड़े इंसान की चरणों में अपनी स्वतंत्रता अर्पण मत करना और अपनी संस्थाए नष्ट करने तक की सत्ता उनके हाथ मत सौपना। जिन थोर इंसानो ने देश की निष्ठा पूर्वक सेवा की उनके लिए मन में कृतज्ञ भाव होना इसमें बिलकुल भी गलत नहीं लेकिन कृतज्ञता को मर्यादा होती है।" भक्ती,समर्पण जैसी विभूति पूजा की भरमार हुए अपने देश में डेनियल ओकोनल का इशारा अधिक लागु पड़ता है। भक्ति, समर्पण ये मार्ग अध्यात्म में मुक्ती का मार्ग होगा लेकिन राजकारण में ये हुकुमशाही की और धकेलते है उन्हे आये अनुभव के आधार पर अपमान हिन भाव के वर्तनुक से ही जातिव्यवस्था की तरफ उनका ध्यान गया।





*प्रबंध 

अमरीका में जब वे उच्च शिक्षा हासिल करने गए तब PHD में उन्होंने "cast in india" their mechanism, genesis & develpoment " भारत की जाती - उनकी संरचना,उत्पत्ती और विकास " इस विषय को चुना । हमारे साथ ही ऐसा नीचता पूर्ण बर्ताव क्यों होता हैं, ये सवाल उनको हमेशा परेशान करता रहा। इस वेदना के माध्यम से जो आवाज निकली  वो इस सिर्फ 26 साल के युवा अवस्था के अप्रतिम प्रबंध द्वारा। मुख्य मुद्दा ये की बाबासाहब विदेश में जानेवाले प्रथम व्यक्ति नही थे। उसके पहले, उस समय और आज भी अनगिनत लोग विदेश जाते हैं। लेकिन पुरे देश और विश्व के बारे में सोचने वाले सिर्फ और सिर्फ डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एकमात्र युवा थे। ये सत्य झुटलाया नही जा सकता। बाबासाहब ने जातिव्यवस्था का उगम, विस्तार और वास्तविकता  के रूप में जातिव्यवस्था का पोस्टमार्टम करनेवाला जो प्रबन्ध लिखा वो भारत और पर्यायी विश्व के सभी क्रांतिकारको की समीक्षा, उनके कमजोर क्रांति के सबुत पेश करनेवाला निकला | उसे दुनिया में आज भी तोड नही। इस प्रबंध में फ्रेंच विद्वान सेनार्ट, नेसफील्ड, मैथ्यू अर्नाल्ड, सर डेन्झिल इब्बतसन, रिस्ले, सर एच रिजले से लेकर उस वक्त के भारत के समाज शास्त्रज्ञ के रूप जाने जानेवाले डॉ. केतकर इनके मत की उत्तम समीक्षा,परीक्षण उन्होंने इस प्रबंध में की।

जतिव्यवस्था का  निरिक्षण करते वक्त वे दावे से कहते हैं," जाती का अध्ययन करनेवाले संशोधकोने अनेको गलतियां की | ये ही नही तो संशोधन का मार्ग ही बंद करके रखा है। भारत को छोड़ आज दुनिया का कोई इंसान आदिम मान्यताओं को पकड़ कर नही बैठा हैं। भारत में नानाविध गोत्र है | इस तरह बाकी वर्ग भी है जो कुलदेवताओ को मानते है | ये स्पष्ट निरीक्षण उन्होने इस प्रबंध में किया है | जब तक भारत में जातीयता का अस्तित्व कायम है तब तक हिंदू शायद हि मिश्र विवाह करेंगे या गैरहिंदू के साथ किसी भी प्रकार का  सामाजिक व्यवहार करेंगे | और हिंदू  दुनिया में कही भी गये तो "भारत की जातीप्रथा '' ये जागतिक समस्या बनेंगी | मेरा ध्येय ये धार्मिक मान्यताओ  को जिसे  शास्त्रीय आधार पर उच्चतम  बढाया गया इस प्रवृत्ती कि निरर्थकता दिखाना है | "

ऐसा कहने वाले बाबासाहाब बुद्धीवादियो को समझ में ना आये यही दुखद है|..