जाणिये RSS के राष्ट्रप्रेम कि सच्चाई : कितना आदर करते है / करते थे तिरंगे का ? - HUMAN

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Thursday, 29 November 2018

जाणिये RSS के राष्ट्रप्रेम कि सच्चाई : कितना आदर करते है / करते थे तिरंगे का ?



बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी ने जब हिम्मत कि RSS के मुख्यालय में तिरंगा फहराणे कि ....


11 दिसम्बर 1947 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आरएसएस ने एक खुली बैठक में डॉ.अम्बेडकर का पुतला जलाया था, 1948 में राष्टीय ध्वज तिरँगे को पैरों तले रौंदा था। आजादी के बाद 52 सालों तक आरएसएस ने कभी न तिरँगा फहराया और न कहीं भी तिरंगे को सैल्यूट किया। अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था। इन तीनों आरोपियों में बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में शामिल थे।

राष्ट्रप्रेमी युवा दल के यह तीनों सदस्य दरअसल इस बात से क्षुब्ध थे कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी आरएसएस के दफ्तरों में कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता। सवाल यह है कि जिस भवन पर यह युवक तिरंगा फहराना चाहते थे वो कोई मदरसा नहीं था न कश्मीर का लाल चौक। वो तो आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय था जिसकी देशभक्ति पर आज कोई भी सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता तब फिर क्या वजह थी कि संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा दर्ज हो गया और 12 साल तक वो लड़के संघ के निशाने पर बने रहे?


यह भी पूछना लाजमी है कि नागपुर की अदालत में यह मुकदमा दर्ज होने के बाद 2002 में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने का निश्चय क्यों किया गया? क्या इसलिए कि आरएसएस यह समझ गया था कि इस मुकदमे का हवाला देकर उसकी देश के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े किये जायेंगे? या इसलिए कि भगवा झंडे के बजाय तिरंगे से जुड़ी जनभावनाओं का सहारा लेकर उसे अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाना आसान लगने लगा था? ये  लोग कश्मीर पर जब जब तिरँगा जलाया जाता है तो खूब नाकों दम करते हैं जबकि कश्मीर में धारा 370 के तहत 2 ध्वज का प्रावधान है और वे इसी का फायदा उठाकर ऐसा करते हैं लेकिन वे तो उसी कानून की आड़ के ऐसा करते हैं तुम भी बताओ तुम क्यों करते आये हो?

जब उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं

याद होगा जब 2004 में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ-साथ उमा भारती को नागपुर के आरएसएस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए। तब जाकर आरएसएस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया। 2004 के विवाद के दौरान भी उतनी ही हड़कंप मची थी जितनी आज मची हुई है, लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए बीजेपी की धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी आजकल हो रही है।





तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे जा रहे हैं। अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी भी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आरएसएस के नागपुर_मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें। रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से क्यों चिढ़ी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा  रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था?

जब उमा भारती ने 2004 हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार द हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था। उन्होंने सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है. खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ_संस्‍था आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था। 1930 और 1940 के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आरएसएस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया आरएसएस वालों ने कभी उसे सैल्यूट तक नहीं किया। आरएसएस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया।

तब आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे

30 जनवरी 1948 को जब महात्मा_गाँधी की हत्‍या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि  आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे। यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं. आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी। उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे। 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीड़ा को व्यक्त किया था। उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आरएसएस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं। 9 अगस्त 2018 को कुछ हिंदूवादी संगठनों इतिहास दोहरा दिया है। उन्होंने सार्वजनिक मंच से भारत के संविधान को जलाया और अम्बेडकर मुर्दाबाद के नारे लगाये।

26 जनवरी को कुछ हिंदूवादी उग्र संगठन काला दिवस के रूप में मनाते आये है 

1947 से अबतक हर वर्ष 26 जनवरी को कुछ हिंदूवादी उग्र संगठन काला दिवस के रूप में मनाते आये है लेकिन अब उनके निशाने में 15 अगस्त भी शामिल हो गया है।  वैसे भी जब तुम संविधान जला सकते हो तो कैसे तुम कश्मीर के पत्थरबाजों और भारत के खिलाफ नारेबाजी करने वालों को देशद्रोही कह सकते हो? क्योंकि तुम खुद एक देशद्रोही हो और मेरी नजर में तुम दोनों ही समान हो। इसबार इन्होंने न केवल संविधान की प्रतियां जलाई बल्कि उन्होंने मनुवाद जिंदाबाद, मनुस्मृति जिंदाबाद, ब्राह्मण एकता जिंदाबाद, सवर्ण एकता जिंदाबाद के भी खूब नारे लगाये। जबकि sc/st एक्ट, आरक्षण, संविधान, अम्बेडकर सब मुर्दाबाद। और आपकी आज भी जिद है कि मंदिर जाना है और मंदिर जाकर चढ़ावा चढ़ाना है ताकि इनके बच्चे उस चढ़ावे से खूब पढ़ लिख सकें और फिर आपके खिलाफ लड़ने आएं।