भीमा कोरेगाव द्वंद्व (पार्ट ६) : पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था - HUMAN

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Sunday, 30 December 2018

भीमा कोरेगाव द्वंद्व (पार्ट ६) : पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था

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 “पेशवा बाजीराव की 28 हज़ार सैनिकों की फौज को बुरी तरह धूल चटा दी। महार रेजिमेंट के शौर्य और अदम्य साहस जैसी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती…!”

★दलित शौर्य का गौरवशाली इतिहास★


आखिर क्या है भीमा कोरेगांव की लड़ाई ?


1 जनवरी 1818 को पुणे के पास सिर्फ 500 महार सैनिकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28 हज़ार सैनिकों की फौज को बुरी तरह धूल चटा दी थी। ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट के शौर्य और अदम्य साहस जैसी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती। पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था। मराठों के साथ छल करके ब्राह्मण पेशवा जब सत्ता की कुर्सी पर आए तो उन्होंने शूद्रों को नरक जैसी यातनाएं देना शुरू कर दिया।

पेशवा राज में शूद्रों को थूकने के लिए गले में हांडी टांगना ज़रूरी था। साथ ही शूद्रों को कमर पर झाड़ू बांधना ज़रूरी था जिससे उनके पैरों के निशान मिटते रहें। शूद्र केवल दोपहर के समय ही घर से बाहर निकल सकते थे क्योंकि उस समय शरीर की परछाई सबसे छोटी होती है। परछाई कहीं ब्राह्मणों के शरीर पर ना पड़ जाए इसलिये उनके लिए यह समय निर्धारित किया गया था। शूद्रों को पैरों में घुंघरू या घंटी बांधनी ज़रूरी थी ताकि उसकी आवाज़ सुनकर ब्राह्मण दूर से ही अलर्ट हो जाएं और अपवित्र होने से बच जाएं।

ऐसे समय में जब पेशवाओं ने दलितों पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किये, उनका हर तरह से शोषण किया, तब उन्हें ब्रिटिश सेना में शामिल होने का मौका मिला। अंग्रेज़ चालाक थे और ब्रिटिश सेना में शामिल सवर्ण, शूद्रों से कोई संबंध नहीं रखते थे, इसलिये अलग से महार रेजिमेंट बनाई गई।






“पेशवा सेना के साथ महारों का सामना हुआ तो वे शेरों की तरह टूट पड़े, सिर्फ 500 महार सैनिकों ने पेशवा के 28,000 सैनिकों को धूल चटा दी…!”


महारों के दिल में पेशवा साम्राज्य के अत्याचार के खिलाफ ज़बरदस्त गुस्सा था, इसलिये जब 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में पेशवा सेना के साथ उनका सामना हुआ तो वो उन पर शेरों की तरह टूट पड़े। सिर्फ 500 महार सैनिकों ने बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को धूल चटा दी।

महारों में अंग्रेजी सिपाही होने से ज़्यादा जातीय भेदभाव और अपमान का बदला लेने की ललक थी। इस तरह इस ऐतिहासिक लड़ाई में महारों ने अपने अपमान का बदला लिया।


इस जीत ने वर्ण व्यवस्था पर ऐसा प्रहार किया कि वो आज तक संभल नहीं पाया। 1 जनवरी को इसी लड़ाई का शौर्य दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने देश भर के लाखों दलित व बहुजन लोग भीमा कोरेगांव में जुटते है। ये लड़ाई अन्याय, शोषण और अपमान के प्रतिरोध का प्रतीक है। जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा। अंग्रेज़ों ने वीर महारों की याद में विजय स्तंभ बनवाया जो आज लाखों दलितों के लिए प्रेरणा का प्रतीक है।

सवाल तो उन भगवाधारी गुंडों से पूछा ही जाना चाहिए…
जो दलितों के स्वाभिमान जीवन को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।

क्रमश :-- कल के पोस्ट में आगे का परिच्छेद…..