बौद्ध धम्म में पूजा का अर्थ - HUMAN

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Tuesday, 4 December 2018

बौद्ध धम्म में पूजा का अर्थ

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बौद्ध धम्म में पूजा का अर्थ


लोग बौध्द धम्म में मूर्ति पूजा से संबंधित अनेको सवाल उठाते दिखाई देते  हैं उन्ही में से एक की, बौद्ध धम्म में मूर्ति पूजा की प्रथा प्रचलित नही हैं, फिर भी बौद्ध लोग मूर्तिपूजा करते हैं, त्रिशरण, पंचशील ग्रहण करते हैं इन बातों पर उनकी टिप्पणी होती हैं। बौद्ध धम्म की कुछ विधिया जैसे परित्राण पाठ,पुण्यानुमोदन, स्मृतिदिन यह भी कर्मकांड का ही एक प्रकार है ऐसा समझते हैं। बौद्धो ने बाबासाहब और बुद्ध के प्रतिमा के सामने नतमस्तक होकर त्रिशरण, पंचशील ग्रहण करना, विहार जाना इन बातों से भी इनको ऐतराज होता है। उनके मता नुसार बुद्ध पूजा निरर्थक है और हिन्दू धर्म में प्रचलित कर्मकांड का ही वो एक प्रकार हैं।

बाबासाहब ने संपादित की हुयी पाली डिक्शनरी में इसका अर्थ ...

असल में बौद्ध लोग जब तथागत की पूजा करते हैं तो वो क्या करते हैं? क्या वे तथागत के सामने कुछ मांगते हैं?व्रत रखते हैं? उपवास रखते है ? इसका जवाब नाकारार्थी आपको मिलेगा। बाबासाहब ने संपादित की हुयी पाली डिक्शनरी में इसका अर्थ मौजूद हैं। पूजा का मतलब सतर्क होना, सम्मान दर्शाना, सचेत रहना। मतलब बुद्ध पूजा में बुद्ध की प्रतिमा के सामने नतमस्तक होकर उस ऐतिहासिक महान इंसान को सम्मान देना। उसी के साथ अपना बर्ताव दुसरो के प्रती अच्छा रहे इसके लिए सतर्क रहना।


भीतर के ज्ञानी पुरुष को जाग्रत करना।

इसका दूसरा मतलब अपने भीतर के ज्ञानी पुरुष को जाग्रत करना। मूलतः बुद्ध, धम्म और संघ को वंदन करना मतलब ऐतिहासिक पुरुषोत्तम के प्रती आदरभाव व्यक्त करना, तथागत द्वारा बहाल किये हुए धम्म के प्रती जाग्रत रहकर उसका अनुसरण करना,संघ वंदना मतलब धम्म के राह पर प्रतिष्ठित,सदाचारी ऐसे श्रेष्ठ भिक्खु संघ का अनुसरण करना। यह खुद को अच्छी राह पर ले जाने की कोशिश हैं। बुद्ध और बाबासाहब ये इतिहास के जनकल्याण कारी महापुरुष हैं। उनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करना, आदरभाव व्यक्त करना मतलब उनकी पूजा करना। उनका भक्त बनकर उनकी पूजा करना नही! इस वजह से बौद्ध धम्मिय लोगो ने की हुयी पूजा और बाक़ी धर्मीय लोगो द्वारा की हुयी पूजा इसमें बहुत फर्क हैं। त्रिशरण और पंचशील तो स्वअर्पण करनेवाली पूजा हैं। रोज करणे वाली प्रतिज्ञा मतलब है हमेशा अपने कार्य के प्रती, कर्तव्यप्रती, आचरण के प्रती के जाग्रत रहना, दक्ष होना है।




बाबासाहब ने भी इसके संबंध में एक एक छोटासा भाग वॉ ल्युम न. 16 में दिया है। इसमें एक बात बताना चाहती हु, बदलते वक्त अनुसार बदलती मातृभासा में ये बाते समझ लेनी चाहिए। जिनको पाली भाषा का ज्ञान है उन्होंने पूजा पाली भाषा में करने पर ऐतराज नही है। लेकिन जिनको पाली भाषा का ज्ञान नही उनके सामने पाली भाषा के गाथा का उच्चारण मंत्रो के  जैसे ही होगा और इस पूजा और प्रतिज्ञा के  उच्चारण का कुछ भी उपयोग नही होगा। इसलिए बौद्ध धम्मिय लोगो ने पाली भाषा का ज्ञान लेना चाहिए या फिर पाली भाषा में मौजूद गाथाओं का मतलब समझ लेना चाहिए। सिर्फ सुनना अच्छा लगता है इसलिए वो सुरिले स्वर में नही गाना है।

बौद्ध धम्म के संस्कारविधि

रहा सवाल नामकरण विधी, ख़ुशी के मौके पर या दुःखद समय पर बौद्ध धम्म के संस्कारविधि पूरे करने  चाहिए या नही तो यकीनन इसका जवाब हा हैं। यह विधि समय, प्रसंग  देख जल्द  पुरे किये जा सकते हैं लेकिन हो सके तो समानता इसमे होनी चाहिए। जलदान विधि जैसे कार्यक्रम वर्तमान स्थिति में पर्यावरण के लिए हानिकारक होने की वजह से हो सके तो अस्थि जमीन में ही दफनादि जाये और उसपर किसी पौधे को लगाया गया तो वह विधि पर्यावरण पूरक और पर्यावरण स्नेही होगा। नामकरण, ख़ुशी के प्रसंग ,स्मृतिदिन,पुण्यानुमोदन के प्रसंग पर परित्रन पाठ का आयोजन ना करते हुए प्रसंगानुरूप धम्म प्रवचन या धम्म पाठ का आयोजन ज्ञानी भिक्खु या प्रज्ञावान उपासक के हाथों कर ले, जिससे की धम्म की कुछ अच्छि बातो का ज्ञान उन्हें मिल सके। उस विधि का स्वरूप कर्मकांड की तरह न होकर आचरनशील, क्रियाशील और जीवन में दक्ष जागृत रहकर आचरण किस तरह किया जाये इसकी शिक्षा और आचार संहिता आपको देनेवाला होगा। जो पूजनीय है उनके लिए मन में आदरभाव रखना,सम्मान देंना ये बौद्ध संस्कृती का हिस्सा हैं। उस वजह से तथागत, धम्म,आदरणीय और अनुकरणीय भिक्खु संघ और बाबासाहब इनके प्रति सम्मान की भावना मन में रख पूजा करना बौद्ध संस्कृती से अनुकूल ही हैं।