भीमा कोरेगाव द्वंद्व (पार्ट ५) : अंग्रेज़ों की नहीं, महारों के गुस्से की जीत थी... - HUMAN

Breaking

Saturday, 29 December 2018

भीमा कोरेगाव द्वंद्व (पार्ट ५) : अंग्रेज़ों की नहीं, महारों के गुस्से की जीत थी...

human



 “‘भीमा कोरेगांव’ अंग्रेज़ों की नहीं, महारों के गुस्से की जीत थी…!”

★दलित शौर्य का गौरवशाली इतिहास★


आज़ाद भारत में अंग्रेज़ों की जीत का जश्न क्यों ? इस सवाल के जरिये मनुवादी मीडिया और ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग भीमा कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई को अंग्रेज़ों की लड़ाई साबित करने की साज़िश कर रहे हैं। वो पूछ रहे हैं कि 200 साल पहले अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मनाकर दलित देश विरोधी काम क्यों कर रहे हैं ? असल में ये लोग हकीकत को बड़ी ही चालाकी से छुपा रहे हैं। ऐसे लोगों से मेरे कुछ सवाल हैं।

आप इंडिया गेट को कैसे देखते हैं ?


अगर भीमा कोरेगांव जैसी ऐतिहासिक लड़ाई आपके लिए सिर्फ अंग्रेजी सेना की जीत है और उस पर गर्व करने का आपके पास कोई कारण नहीं है तो फिर ये बताइये कि 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट आपके लिए गर्व का प्रतीक क्यों है ? इंडिया गेट प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों की तरफ से लड़कर शहीद होने वाले भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था। 13,000 से ज़्यादा शहीदों के नाम इंडिया गेट पर उकेरे गए हैं। ये सैनिक फ्रांस, अफ्रीका और अफगानिस्तान जैसे मोर्चों पर लड़े थे जिनका मकसद ना भारत को आज़ाद कराना था और ना ही अंग्रेज़ों से विद्रोह करना, तो बताइये आप आज़ाद भारत में इंडिया गेट को कैसे देखते हैं ?





“‘सारागढ़ी की लड़ाई, हाइफा युद्ध व भीमा कोरेगांव की तुलना…

मंगल पांडे पर क्यों गर्व करते हैं?


मंगल पांडे ब्रिटिश सेना का सिपाही था जो मज़े से तब तक अंग्रेज़ अफसरों के हुक्म का पालन कर रहा था जब तक उसे मातादीन भंगी ने ये ताना नहीं दिया, ‘तू शूद्र से भेदभाव करता है लेकिन गाय के मांस का बना कारतूस मुंह से फाड़ता है।’ इससे पहले तक उसे ब्रिटिश सिपाही होने में कोई दिक्कत थी ही नहीं। मंगल पांडे ने वैसे भी अपनी हिंदू धार्मिक भावना के आधार पर विरोध किया था ना कि भारत मां की आज़ादी के लिए, तो क्या आप मंगल पांडे पर गर्व करना छोड़ देंगे ?
विद्रोह का अपना महत्व होता है। इतिहास की हर घटना का अपना महत्व और प्रासंगिकता होती है। ऐसे में भीमा कोरेगांव की लड़ाई को बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं ?


सारागढ़ी की लड़ाई का क्या ?


12 सितंबर 1897 को खैबर पख्तूनख्वा में लड़ी गई सारागढ़ी की लड़ाई को क्या कोई झुठला सकता है ? ब्रिटिश सेना के 21 सिख सैनिकों ने अफगान सेना के 10 हज़ार सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे। क्या उस वक्त इन 21 बहादुरों का मकसद भारत की आज़ादी था ? शायद नहीं, क्योंकि वो सब तो ब्रिटिश सेना की नौकरी कर रहे थे। तो क्या आप इस लड़ाई को इतिहास के पन्नों में दफना सकते हैं ? क्या आपके लिए इस अदम्य साहस और वीरता की लड़ाई में गर्व की कोई बात नहीं ?

आप हाइफा युद्ध को कैसे देखते हैं ?


23 सिंतबर 1918 को विदेशी सरज़मीं पर लड़ी गई हाइफा की ऐतिहासिक लड़ाई में भी तो भारतीय सैनिक अंग्रेज़ों की तरफ से लड़े थे, क्या उन राजपूत जवानों की बहादुरी पर गर्व नहीं करना चाहिए ? क्या दिल्ली के तीन मूर्ति चौक (अब हाइफा चौक) से गुज़रते हुए हमें सम्मान और जोश की अनुभूति नहीं करनी चाहिए ? ये सभी सैनिक भी तो अंग्रेज़ों के लिए ही लड़े थे।

क्रमश :-- कल के पोस्ट में आगे का परिच्छेद…..