कर्मकांड विरोधी माता सावित्रीबाई फुले कि बेटीया : इतनी अंधविश्वासी क्यो ? - HUMAN

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Thursday, 3 January 2019

कर्मकांड विरोधी माता सावित्रीबाई फुले कि बेटीया : इतनी अंधविश्वासी क्यो ?




क्या आप सच में माता सावित्री की बेटीया हो ? 

औरतो को सर्वप्रथम मान सन्मान कि जिंदगी देणे वाले विश्व कें प्रथम ज्ञानी पुरुष तथागत गोतम बुद्ध , स्त्रियो ने भी पढना चाहिये, शैक्षणिक प्रवाह सम्मिलित होणा चाहिये इसके लिये सतत कार्यरत रहने वाले महात्मा फुले, खुद पढी,प्रथम शिक्षिका, मुख्याध्यापिका बनी वो माता  सावित्रीबाई फुले ...इन सबके सपने ना सिर्फ पुरे किये बल्की जिंदा रखे, भारतीय औरतो के उद्धारकर्ते डॉ.बाबासाहाब आंबेडकर .....

आज माता सावित्री बाई फुले का जन्मदिन और बालिका दिन जोर सोर मनाया जा रहा है | औरते बता रही है,'हम सावित्री कि बेटीया है |'' कभी कभी गर्व महसूस होता है इस बात पर..! लेकीन गौर से सोचने पर सवाल खडा होता है मन में क्या ये सच में माता सावित्री कि बेटीया है ? 

क्योंकी माता सावित्री ने अपने पूर जीवन मेंअनगिनत कठनाइयो का सामना किया | खुदपर गोबर, पत्थर का मार सहा |  इतनी तकलीफो से गुजरते हुये उन्होने अभूतपूर्व योगदान इन औरतो के लिये दिया | लेकीन समाज कि कुछ गिनी चुनी महिलाओ को छोड कितनी औरते इनके कार्य कें प्रती जागरूक दिखाई देती है या अपने तरक्की का श्रेय माता सावित्री को देती है | 





सावित्री बाई का चरित्र पढने पर पता चलेगा कि, उन्होने अपने पुरे जीवन में कभी उपवास नही किया और नही किसी भी प्रकार का व्रत रखा | फिर अपनी मा ने कभी ये सब नही किया तो खुद को उनकी बेटीया समझने वाली ये औरते क्यो करती है ऐसा ? अगर आप ये सब करती हो तो खुद को उनकी बेटीया कहलाने का हक कैसे रखती हो खुद को पुछ्ने जैसा ये सवाल है | स्त्रियो को शिक्षा के प्रवाह में इसलिये माता सावित्रीबाई ने सम्मिलीत किया था क्या ? पुरुषप्रधान संस्कृती में स्त्रियो को कम लेखा जाता था | उसके साथ समानता पूर्ण व्यवहार हो, उन्हे न्याय मिले, उनका हक उन्हे  मिले इसलिये इन महापुरुषो ने ये कार्य किये ....

महात्मा फुले,सावित्रीबाई फुले इनके विचार पढने पर पता चला चलेगा कि ये कर्मकांड के प्रखर विरोधी थे, लेकीन हम उनके विचारो को ना मानणे वाले, सिर्फ दिखावा करणे वाले लोग है |







   ज्योतिबा का पक्का विश्वास था की ,स्त्रियो और शुद्रो के पढाई के बिना देश का विकास असंभव है | दोस्त के शादी मे से जब उन्हे शुद्र कह्के अपमानित कर निकाला गया तब वे विचलित हो उठे | यह कैसा मनुष्य मनुष्य मे भेदभाव ? उन्होने स्त्रियो और शूद्रो के शिक्षा का कार्य हाथ मे लिया | स्त्री और शूद्रो का अज्ञान दूर करणे हेतू उन्होने स्कूलो का निर्माण किया |'One good mother is equal to hundred teacher' |पढी लिखी औरत हि अपने बच्चो परअच्छे संस्कार कर सकती है, और उन्हे  एक बेहतरीन इन्सान  बना सकती है |१ जनवरी १८४८ को पुना के बुधवार पेठ के शनिवार वाडा मे स्त्री शिक्षा की शुरवात हुयी | यही से आरंभ हुवा भारतीय  स्त्री के सुनहरे भविष्य का और इस स्कूल की शिक्षिका थी सावित्रीबाई फुले | एक औरत का  घर से बाहर पढाने जाना उस समय मे भारतीय नारी के सार्वजनिक जीवन का प्रारंभ था|